रायपुर नगर निगम का कागजी चमत्कार : 18 लाख की नाली फाइलों में बनकर तैयार, जमीन से गायब; हाईकोर्ट के आदेश को भी ठेंगा दिखा रहे अफसर

रायपुर नगर निगम का कागजी चमत्कार : 18 लाख की नाली फाइलों में बनकर तैयार, जमीन से गायब; हाईकोर्ट के आदेश को भी ठेंगा दिखा रहे अफसर

रायपुर। रायपुर नगर निगम की कार्यप्रणाली एक बार फिर भ्रष्टाचार और भारी अनियमितताओं के दलदल में धंसी नजर आ रही है। पंचशील नगर क्षेत्र में नाली निर्माण के नाम पर सिस्टम ने ऐसा 'कागजी चमत्कार' किया है कि सरकारी फाइलों में 18 लाख रुपए की नाली बनकर तैयार हो चुकी है, ठेकेदार को भुगतान भी हो चुका है, लेकिन जमीन पर इसका कोई नामोनिशान नहीं है। हद तो तब हो गई, जब इस पूरे मामले में माननीय उच्च न्यायालय के सख्त आदेश को भी निगम के बेलगाम अफसरों ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया है।

फाइलों में बह रहा पैसा, घरों में घुस रहा गंदा पानी

जोन-4 के पंचशील नगर में नाली निर्माण के लिए वर्ष 2020 में प्रस्ताव भेजा गया था। निगम के रिकॉर्ड्स गवाही दे रहे हैं कि वर्ष 2023 में लगभग 18 लाख रुपए की लागत से इस कार्य को प्रशासनिक स्वीकृति मिली। ठेकेदार को इस काम की पूरी रकम भी दे दी गई। लेकिन हकीकत यह है कि इलाके में आज तक कोई नाली नहीं बनी। क्षेत्र के रहवासी भारी जलभराव से त्रस्त हैं। नालियों का गंदा पानी सीधे उनके घरों में घुस रहा है, जिससे पूरे इलाके में गंभीर बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। एक तरफ जनता बेहाल है, तो दूसरी ओर अफसरों की मिलीभगत से कागजों में विकास की गंगा बहा दी गई है।

हाईकोर्ट के आदेश की कोई परवाह नहीं

इस घोर लापरवाही का मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा, तो न्यायालय ने 6 अक्टूबर 2025 को सख्त रुख अपनाकर तय समय-सीमा में कार्य पूरा करने के स्पष्ट निर्देश दिए। सुनवाई के दौरान शासन ने कोर्ट में दावे किए कि टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और निर्माण जल्द पूरा कर लिया जाएगा। लेकिन निगम अफसरों के हौसले इतने बुलंद हैं कि अदालत के सख्त आदेश के महीनों बाद भी जमीन पर एक ईंट नहीं रखी गई है।

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आखिर 18 लाख गए तो गए कहां?

जब जमीनी हकीकत की पड़ताल की गई तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। मौके पर केवल एक मकान के पीछे नाममात्र का आंशिक कार्य हुआ था, जिसे आपसी विवाद का हवाला देकर रोक दिया गया। सूत्रों का कहना है कि इस स्वीकृत राशि को नियमों को ताक पर रखकर वार्ड के किसी अन्य कार्य में खपा दिया गया। यह अब तक एक बड़ा सवाल है कि जनता की गाढ़ी कमाई के 18 लाख रुपए आखिर किसकी जेब में गए?

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जिम्मेदार मौन, अवमानना की लटकती तलवार

इस पूरे गोलमाल पर निगमायुक्त विश्वदीप का रटा-रटाया जवाब सामने आया है। उनका कहना है, "यह मामला वर्ष 2023 का है। मामले की जांच के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। आदेश के तहत जल्द ही निर्माण कार्य कराया जाएगा।

वहीं, उच्च न्यायालय के अधिवक्ता वैभव शुक्ला ने स्पष्ट किया है कि, "यदि न्यायालय के 6 अक्टूबर 2025 के आदेश के बाद भी निर्माण कार्य प्रारंभ नहीं हुआ है, तो यह सीधे अदालत की अवमानना है। पीड़ित पक्ष अवमानना याचिका दायर कर सकता है। न्यायालय दोषी अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करने में पूरी तरह सक्षम है।

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