दस भुजाओं में हंसिया से लेकर धान की बाली तक, छत्तीसगढ़ी महतारी के रूप में विराजेंगी मां दुर्गा
बिलासपुर : शारदीय नवरात्रि को लेकर बिलासपुर में तैयारियां अब अंतिम दौर में पहुंच गई हैं। शहर के चप्पे-चप्पे में दुर्गा पंडाल आकार लेने लगे हैं और हर साल की तरह इस बार भी दुर्गा उत्सव समितियों के बीच एक से बढ़कर एक थीम तैयार करने की होड़ है। इन सबके बीच अशोकनगर चौक स्थित मां शेरावाली दुर्गा उत्सव समिति का पंडाल इस बार आस्था के साथ छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, कृषि और परंपरा का अनूठा संगम प्रस्तुत करने जा रहा है।
यहां मां जगदंबा इस बार अपने पारंपरिक स्वरूप से अलग ‘छत्तीसगढ़ी महतारी’ के भव्य और मनमोहक रूप में विराजेंगी। माता का यह स्वरूप केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं होगा, बल्कि छत्तीसगढ़ की माटी, मेहनत, खेती-किसानी और समृद्ध लोकपरंपरा को भी अपने भीतर समेटे नजर आएगा।
दस भुजाओं में दिखेगी छत्तीसगढ़ की पहचान
मां दुर्गा की दस भुजाओं को इस बार छत्तीसगढ़ की कृषि और ग्रामीण जीवन से जोड़ा गया है। माता के हाथों में हंसिया, धान की बाली, धान का कटोरा, नांगर, त्रिशूल, वरद मुद्रा, टंगिया, रापा, सबर और गैती दिखाई देंगे। इन प्रतीकों के जरिए खेती-किसानी से लेकर श्रम और छत्तीसगढ़ की पारंपरिक जीवनशैली को दर्शाया जाएगा। माता को हरे रंग की पारंपरिक छत्तीसगढ़ी साड़ी पहनाई जाएगी। हरे रंग के इस परिधान में छत्तीसगढ़ की हरियाली और प्राकृतिक संपदा की झलक देखने को मिलेगी। सिर पर धान की बालियों और पत्तियों से प्रेरित विशेष मुकुट माता के स्वरूप को और खास बनाएगा।
गहनों में भी झलकेगी माटी की संस्कृति
माता का श्रृंगार भी पूरी तरह छत्तीसगढ़ी संस्कृति के अनुरूप किया जाएगा। सुतिया, हंसली, पुतरी माला, खिनवा, फुल्ली, ककनी, ऐंठी, पैरी, मांग टीका और करधन जैसे पारंपरिक आभूषण माता के स्वरूप की शोभा बढ़ाएंगे। माता के पीछे छत्तीसगढ़ का भौगोलिक नक्शा भी बनाया जाएगा। इससे पूरा दृश्य ऐसा प्रतीत होगा मानो छत्तीसगढ़ी महतारी अपने पूरे प्रदेश को आशीर्वाद दे रही हों।
मांदर की थाप पर नजर आएंगे गणेश और कार्तिक
इस थीम की सबसे खास झलक माता के साथ नजर आने वाले गणेश और कार्तिक के स्वरूप में देखने को मिलेगी। दोनों को मांदर बजाते हुए दिखाया जाएगा। कंधे या गले में रस्सी के सहारे मांदर लटकाए दोनों हाथों से थाप देते हुए गणेश और कार्तिक छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोकजीवन और संगीत की झलक प्रस्तुत करेंगे। मांदर छत्तीसगढ़ सहित आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में प्रचलित पारंपरिक ताल वाद्य है। इसे थीम में शामिल कर समिति ने धार्मिक आयोजन को स्थानीय लोकसंस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया है।
खेत में काम करती नजर आएंगी लक्ष्मी और सरस्वती
पंडाल की थीम में मां लक्ष्मी और सरस्वती के स्वरूप को भी छत्तीसगढ़ी ग्रामीण परिवेश से जोड़ा गया है। दोनों को खेतों में काम करते हुए दिखाया जाएगा। हाथों में धान की बालियां और हल जैसे कृषि उपकरणों के साथ छत्तीसगढ़ी वेशभूषा में उनके स्वरूप तैयार किए जाएंगे। इस पूरी प्रस्तुति के जरिए यह संदेश देने की कोशिश होगी कि छत्तीसगढ़ की समृद्धि केवल खजाने में नहीं, बल्कि उसकी मिट्टी, खेत, धान और मेहनतकश लोगों के हाथों में भी बसती है।
‘मां’ के रूप में दिखेगा छत्तीसगढ़ का पूरा जीवन
मूर्तिकार सुजीत सूत्रधार के अनुसार, छत्तीसगढ़ी महतारी हमारे राज्य की देवी के रूप में लोगों के मन में विशेष स्थान रखती हैं। इसी विचार को केंद्र में रखकर इस बार मां दुर्गा को छत्तीसगढ़ी महतारी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि एक मां अपने बच्चों की हर परिस्थिति में देखभाल करती है। जरूरत पड़ने पर खेत में काम करती है तो घर की जिम्मेदारियां भी संभालती है। मां के इसी त्याग, श्रम और ममता को छत्तीसगढ़ की मिट्टी और संस्कृति से जोड़कर इस थीम में दिखाने का प्रयास किया गया है।
अशोकनगर चौक का यह पंडाल इस बार केवल पूजा और दर्शन का केंद्र नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की माटी, मेहनत, कृषि, लोककला और मातृत्व को एक ही स्वरूप में देखने का अवसर देने जा रहा है। नवरात्रि में यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को मां दुर्गा के साथ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा के भी दर्शन होंगे।
