SECL खदान विस्तार का भारी विरोध: 5 गांवों की 11 हजार आबादी पर मंडराया विस्थापन का संकट, ग्रामीणों ने सील किया गांव; फोर्स की आहट
NJV डेस्क, सूरजपुर/अंबिकापुर। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में एसईसीएल (SECL) की महान-3 खदान के विस्तार को लेकर हालात तनावपूर्ण हो गए हैं। अंबिकापुर-प्रतापपुर मार्ग पर स्थित मदननगर और उसके आसपास के इलाके पिछले 27 दिनों से भारी गहमागहमी का केंद्र बने हुए हैं। खदान विस्तार की भनक लगते ही ग्रामीणों ने मोर्चा खोल दिया है। स्थिति यह है कि ग्रामीणों ने अपने गांव की सीमाएं पूरी तरह से सील कर दी हैं और किसी भी बाहरी व्यक्ति या सर्वे टीम के प्रवेश पर सख्त पाबंदी लगा दी है।
प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन के लिए यह मामला गले की हड्डी बन गया है। बताया जा रहा है कि हालात को काबू में करने और सर्वे का काम आगे बढ़ाने के लिए प्रशासन अब भारी पुलिस बल (फोर्स) तैनात करने की तैयारी कर रहा है, जिससे इलाके में टकराव की आशंका और गहरी हो गई है।
विस्थापन की जद में 5 गांव, 11 हजार की आबादी
महान-3 खदान के विस्तार प्रोजेक्ट के तहत इलाके के पांच प्रमुख गांवों का वजूद खतरे में है। इनमें मदननगर, गणेशपुर, कनकनगर, चऊरा और जगन्नाथपुर शामिल हैं। इन गांवों की कुल आबादी करीब 11 हजार है। पीढ़ियों से यहां रह रहे इन ग्रामीणों के सामने अब अपने घर और जमीन छिन जाने का संकट खड़ा हो गया है। ग्रामीणों का साफ कहना है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी पुश्तैनी जमीन नहीं छोड़ेंगे।
गुपचुप सर्वे और फूटा ग्रामीणों का गुस्सा
इस पूरे विवाद की जड़ प्रशासन और प्रबंधन का वह रवैया है, जिसे ग्रामीण 'धोखाधड़ी' बता रहे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक:
वर्ष 2023 में ग्रामीणों को भनक लगे बिना ही चोरी-छिपे जमीनों का सर्वे कर लिया गया। कुछ लोगों के खातों में गुपचुप तरीके से मुआवजे की मामूली रकम भी डाल दी गई।
एक साल पहले जब एसईसीएल के कर्मचारी अचानक जमीन खाली कराने पहुंचे, तब जाकर गांव वालों को इस 'गुपचुप खेल' की भनक लगी।
जब एसडीएम, तहसीलदार और राजस्व अमला सीमांकन के लिए पहुंचा, तो आक्रोशित ग्रामीणों ने उनका घेराव कर दिया, जिसके बाद टीम को बैरंग लौटना पड़ा। सात महीने की शांति के बाद अब फिर से प्रक्रिया तेज होने पर आंदोलन भड़क उठा है।
कौड़ियों के भाव जमीन: 26 लाख की कीमत, 5.5 लाख का मुआवजा
विरोध का सबसे बड़ा कारण मुआवजे की वह राशि है, जिसे ग्रामीण ऊंट के मुंह में जीरा बता रहे हैं। मदननगर निवासी बाबूलाल पोया ने आंकड़ों के साथ प्रबंधन की पोल खोलते हुए बताया कि:
वर्तमान में इस इलाके में खेती योग्य एक एकड़ जमीन की बाजार कीमत लगभग 26 लाख रुपए है। इसके एवज में एसईसीएल महज 5.5 लाख रुपए प्रति एकड़ का मुआवजा दे रहा है।
खदान चालू होने पर अगले 20 सालों में यहां से करीब 26 करोड़ टन कोयला निकाला जाएगा, जिससे कंपनी अरबों कमाएगी, लेकिन अपनी जमीन खोने वाले किसानों को कौड़ियों के भाव निपटाया जा रहा है।
पुराना दर्द: न रोजगार मिला, न पर्याप्त मुआवजा
ग्रामीणों का अविश्वास रातों-रात नहीं पनपा है। उनका तर्क है कि जब महान-3 खदान पहली बार खोली गई थी, तब भी प्रशासन ने बड़े-बड़े वादे किए थे। उस वक्त भी आकर्षक मुआवजा और हर घर से एक सदस्य को नौकरी देने का सब्जबाग दिखाया गया था। हकीकत यह है कि आज तक अधिकांश प्रभावितों को न तो सही मुआवजा मिला और न ही रोजगार। सुंदरी बाई, मदन किशोर और जवाहर सिंह जैसे कई ग्रामीणों की अब स्पष्ट मांग है कि उन्हें पैसों का मुआवजा नहीं चाहिए, बल्कि जमीन के बदले जमीन दी जाए।
क्या कहता है SECL प्रबंधन?
इस पूरे गतिरोध पर एसईसीएल भटगांव क्षेत्र के महाप्रबंधक शरद तिवारी का रुख अलग है। उनके मुताबिक यह पूरा विरोध कुछ लोगों द्वारा प्रायोजित है:
मुआवजे पर:उनका दावा है कि मुआवजा पूरी तरह से सरकारी नियमों और प्रावधानों के तहत तय किया गया है। कुछ तत्व ग्रामीणों को जानबूझकर गुमराह कर रहे हैं।
पुराने लंबित मामलों पर यदि महान-3 खदान खुलने के दौरान किसी ग्रामीण को उसका हक या मुआवजा नहीं मिला है, तो उसकी विधिवत जांच कराई जाएगी। नौकरी और सुविधाओं पर जीएम ने स्पष्ट किया कि इस विस्तार के तहत 1600 नौकरियां दी जानी हैं। इसके अलावा प्रभावितों को अन्य बुनियादी सुविधाएं भी देने की पूरी तैयारी है। उनका यह भी दावा है कि करीब 16 प्रतिशत लोग पहले ही अपना मुआवजा स्वीकार कर चुके हैं।
एक तरफ 11 हजार ग्रामीणों का अपने अस्तित्व को बचाने का जज्बा है, तो दूसरी तरफ कोयला उत्पादन के लिए जमीन अधिग्रहण पर आमादा एसईसीएल प्रबंधन। 27 दिनों की नाकाबंदी के बाद अब यदि प्रशासन बल प्रयोग (फोर्स) का सहारा लेता है, तो सरगुजा-सूरजपुर के इस इलाके में एक बड़े और हिंसक जन-आंदोलन से इंकार नहीं किया जा सकता। सरकार और प्रशासन को इस मसले का हल बातचीत की मेज पर ही खोजना होगा।
