शिक्षा विभाग की घोर लापरवाही चौथी के पेपर में आपत्तिजनक सवाल पूछने वालों को बचा रहे अफसर फाइल दबाकर बैठे

शिक्षा विभाग की घोर लापरवाही चौथी के पेपर में आपत्तिजनक सवाल पूछने वालों को बचा रहे अफसर फाइल दबाकर बैठे

रायपुर. स्कूल शिक्षा विभाग इन दिनों अपनी मनमर्जी और तानाशाही रवैये से चल रहा है। यहां नियम और कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। चौथी कक्षा की अंग्रेजी परीक्षा में एक बेहद आपत्तिजनक और विवादित सवाल पूछा गया था। इस मामले ने पूरे छत्तीसगढ़ में भारी बवाल मचाया था। शासन स्तर पर मामले की गंभीरता को देखते हुए अवर सचिव ने 20 मार्च तक जांच रिपोर्ट तलब की थी। लेकिन डीपीआई यानी लोक शिक्षण संचालनालय के अफसर दोषियों को खुलेआम बचाने में लगे हैं। उन्होंने इस बेहद अहम जांच रिपोर्ट को ही दबा दिया है। अब तक यह फाइल शिक्षा सचिव की टेबल तक नहीं पहुंच सकी है। इससे साफ पता चलता है कि शिक्षा विभाग में किस कदर मनमानी हावी है।

इस पूरे विवाद की शुरुआत कक्षा चौथी की अर्धवार्षिक परीक्षा से हुई थी। अंग्रेजी के प्रश्न पत्र में एक ऐसा सवाल पूछ लिया गया जो पूरी तरह से विवादित और छोटे बच्चों के लिए घोर आपत्तिजनक था। बच्चों के मानसिक स्तर को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया और मनमाने तरीके से यह पेपर सेट किया गया। प्रश्न पत्र तैयार करने की जो तय प्रक्रिया होती है उसका रत्ती भर भी पालन नहीं किया गया। जब यह पेपर स्कूलों में बंटा तो हंगामा मच गया। पूरे प्रदेश के अभिभावकों और शिक्षाविदों ने इसकी कड़ी आलोचना की। इसके बाद मामले की शिकायत सीधे लोक शिक्षण संचालनालय में की गई ताकि दोषियों को सजा मिल सके।

बढ़ते दबाव और भारी फजीहत के बाद जांच तो शुरू हुई लेकिन वह विभागीय साठगांठ का शिकार हो गई। जांचकर्ताओं ने जब जिला शिक्षा अधिकारी से इस घोर लापरवाही पर जवाब मांगा तो वे कोई भी स्पष्ट या ठोस जवाब नहीं दे सके। जिम्मेदार अधिकारी के गोलमोल जवाब से जांच टीम भी पूरी तरह असंतुष्ट थी। जांच प्रतिवेदन में यह बात साफ तौर पर लिखी गई कि जवाब बिल्कुल संतोषजनक नहीं है। सारा मामला शीशे की तरह साफ था। इसके बावजूद डीपीआई के आला अफसरों ने इस गंभीर मामले की रिपोर्ट को आगे नहीं बढ़ाया।

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शिक्षा विभाग के अवर सचिव ने सख्त निर्देश दिए थे कि 20 मार्च तक हर हाल में पूरी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। लेकिन विभाग के अफसरों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। समय सीमा बीत जाने के बाद भी फाइल अफसरों की टेबल से आगे नहीं खिसकी। साफ है कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने के बजाय उन्हें पूरा सरकारी संरक्षण दिया जा रहा है। बात सिर्फ जांच रिपोर्ट को आलमारी में दबाने तक सीमित नहीं है। मामले को रफादफा करने की हर मुमकिन कोशिश की गई। इस पूरे मामले में जब सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई तो वहां भी बड़ा खेल किया गया। आरटीआई का जवाब देने में जानबूझकर महीनों की देरी की गई ताकि विभाग की नाकामी और सच्चाई जनता के सामने न आ सके।

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लगातार दबाव बढ़ने पर शिक्षा विभाग ने महज दिखावे के लिए कुछ मामूली कार्रवाई शुरू की थी। लेकिन इसी बीच मामले में कोर्ट से स्टे ले लिया गया। इस स्टे का सीधा फायदा उन दोषियों को मिला जिन्होंने बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया था। आज हालत यह है कि अनियमितता और लापरवाही की इतनी बड़ी शिकायत होने के बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। शिक्षा विभाग के अफसर पूरी तरह से बेलगाम और बेखौफ हो चुके हैं। सवाल सेट करने में हुई इस भयानक लापरवाही के बाद भी किसी पर गाज नहीं गिरना पूरे सरकारी सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर डीपीआई के अफसर किसके दबाव में काम कर रहे हैं। वह कौन सी ताकत है जो चौथी कक्षा के बच्चों के प्रश्न पत्र में विवादित सवाल डालने वालों को बचा रही है। अवर सचिव के आदेशों को दरकिनार करने वाले इन अफसरों पर शासन कब कार्रवाई करेगा। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि शिक्षा विभाग में नीचे से लेकर ऊपर तक सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है। अभिभावक अब शासन के उच्च अधिकारियों से इस मामले में सीधे दखल देने की मांग कर रहे हैं ताकि इस पूरे मामले का पर्दाफाश हो सके और शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा दोबारा कायम हो सके।

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