छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग: एमडी और डायरेक्टर पर सीएम सचिवालय की 'मेहरबानी' - किसकी दया से बचे हैं ये 'साहब' ?

छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग: एमडी और डायरेक्टर पर सीएम सचिवालय की 'मेहरबानी' - किसकी दया से बचे हैं ये 'साहब' ?

रायपुर। छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य विभाग अपने कारनामों से हमेशा सुर्खियों में रहा है, लेकिन अब सवाल ये है कि विभाग के शीर्षस्थ अधिकारी, एमडी और डायरेक्टर, आखिर सीएम सचिवालय की कृपा से अब तक कैसे बचे हुए हैं? प्रदेश में चर्चा है कि स्वास्थ्य विभाग की 'मलाई' ने सप्लायरों के साथ-साथ यहां पदस्थ रहे 'नौकरशाहों' को भी खूब 'लाल-गुलाबी' किया है. सीजीएमएससी में करोड़ों का जो घोटाला हुआ, उसकी कहानी भी अजब-गजब रही. इतने बड़े  खेला में डायरेक्टर और एमडी की मिलीभगत न हो, यह तो असंभव सी बात है. आखिर अब तक की जांच में ये नौकरशाह बेकसूर कैसे हो सकते हैं? अगर इस विभाग की सही जांच कराई जाए, तो अब तक का सबसे बड़ा घोटाला सामने आएगा और कई 'बड़े' चेहरे बेनकाब होंगे.

रीएजेंट खरीदी में मोक्षित कार्पोरेशन व सीजीएमएससी के कुछ अधिकारियों ने खूब मलाई खाई है। 660 करोड़ के रीएजेंट खरीदकर ऐसा खेल किया गया कि देखने वाले भी दंग रह गए। इस खेला में मोक्षित कार्पोरेशन के शशांक चोपड़ा समेत सीजीएमएससी के पांच अफसर अभी जेल में हैं। इस मामले में क्या सप्लायर की बस गलती थी? अब महत्वपूर्ण बात यह है कि तत्कालीन हैल्थ डायरेक्टर व सीजीएमएससी के एमडी पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? बाजार में यह बात की चर्चा है कि नौकरशाहों पर इतनी जल्दी कार्रवाई नहीं होती। इस मामले में जांच एजेंसी पर भी दबाव बनाया जा रहा है। नौकरशाही होने का फायदा इनको दिया जा रहा है। विभाग में अरबों रुपये की सप्लाई बिना हैल्थ डायरेक्टर व एमडी के कैसे हो सकती है? करोड़ों के रीएजेंट का ऑर्डर किसके कहने पर दिया गया है? अरबों के खेल में क्या इन नौकरशाहों की मिलीभगत नहीं रही होगी? सूत्रों के अनुसार, अरबों के खेल में आज भी खेला किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के लोगों का कहना है कि इस मामले में छोटे अधिकारियों को बलि का बकरा बना दिया गया है। सुशासन में सीएम सचिवालय की दगाबाज़ी या अनुग्रह': क्या अरबों के खेल से नौकरशाहों को बचाने की साज़िश रच दी गई है? सीएम सचिवालय के अफसरों की कथित दया से अरबों के मामले से नौकरशाही को बचाने का खेल सेट हो गया है. विभाग के छोटे अधिकारियों को बलि का बकरा  बनाकर, बड़े अधिकारियों को बचाने की जो 'साज़िश' रची जा रही है, उस पर अब सबकी निगाहें टिकी हैं. सुशासन का दावा करने वाली सरकार में क्या सच में ऐसा हो रहा है? अब इस मामले में सूबे के मुखिया क्या करेंगे, क्या वे इस 'खेल' का पर्दाफाश करेंगे या फिर नौकरशाहों को क्लीन चिट  मिलती रहेगी - यह देखना बाकी है.

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