शपथ से पहले साहिबों की साहबी देखिए, राजकीय गीत बजा पर कुर्सी से चिपके रहे भाजपा नेता
बिलासपुर। न्यायधानी के जिला सहकारी बैंक में गुरुवार को नवनियुक्त अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान एक ऐसा नजारा दिखा जिसने छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान पर सवाल खड़े कर दिए। मंच सज चुका था और लाउडस्पीकर पर राजकीय गीत 'अरपा पैरी के धार' की गूंज शुरू हुई लेकिन सामने की पहली पंक्ति में बैठे भाजपा जिलाध्यक्ष और उनके साथ आए दिग्गज कार्यकर्ता अपने मोबाइल की दुनिया में ही खोए रहे। किसी ने भी उठकर खड़े होना तो दूर, अपनी बातचीत तक बंद करना मुनासिब नहीं समझा।
घटना नेहरू चौक के पास स्थित बैंक परिसर की है। कार्यक्रम शुरू होने ही वाला था कि तभी राजकीय गीत बजने लगा। नियम और नैतिकता कहती है कि इस गीत के सम्मान में सावधान की मुद्रा में खड़ा होना चाहिए, लेकिन यहां तो सत्ता का रसूख और मोबाइल के नोटिफिकेशन भारी पड़ गए। जिलाध्यक्ष और पार्टी के अन्य पदाधिकारी आपस में गपियाते रहे और स्क्रीन स्क्रॉल करते रहे। ऐसा लग रहा था मानो उनके लिए राजकीय गीत नहीं बल्कि कोई बैकग्राउंड म्यूजिक बज रहा हो।
जब गूंज रहा था अरपा पैरी के धार, तब मोबाइल में बिजी थे जिम्मेदार
वीडियो में साफ दिख रहा है कि जब पूरा परिसर राजकीय गीत की धुन से ओतप्रोत था, तब ये खास मेहमान अपनी कुर्सियों से ऐसे चिपके थे जैसे उठने पर कुर्सी छिन जाने का डर हो। छत्तीसगढ़ की नदियों और माटी का गौरव गान होता रहा और ये नेताजी लोग डिजिटल दुनिया में व्यस्त रहे। जो पार्टी हर बात पर संस्कृति और राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाती है, उसके जिम्मेदार चेहरों की यह लापरवाही अब शहर में चर्चा का विषय बनी हुई है।
अधिकारी और स्टाफ देखते रह गए
कार्यक्रम में मौजूद बैंक के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हम तो खड़े हो गए थे, लेकिन जब सामने बैठे बड़े नेताओं को ही फुरसत नहीं थी तो माहौल काफी असहज हो गया। वहीं प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि मंच खाली होने का बहाना बनाकर सम्मान न करना केवल तर्क हो सकता है, जबकि हकीकत में यह अपनी ही माटी के अपमान जैसा है।
छत्तीसगढ़ी अस्मिता से खिलवाड़
राजकीय गीत महज एक गाना नहीं है बल्कि यह छत्तीसगढ़ की आत्मा है। जैसे राष्ट्रगान के समय मर्यादा का पालन होता है, वैसे ही अरपा पैरी के धार के समय भी खड़े होने की परंपरा है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जो नेता सार्वजनिक मंचों पर छत्तीसगढ़िया संस्कृति की दुहाई देते नहीं थकते, वे असल मौके पर सम्मान देना क्यों भूल गए? क्या सत्ता की चमक में राजकीय प्रतीकों की अहमियत धुंधली पड़ गई है?
