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फर्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी पाने वालों पर गाज, 50 बर्खास्त और 244 की कुर्सी खतरे में
रायपुर। छत्तीसगढ़ में फर्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे दूसरों का हक मारकर नौकरी करने वालों के बुरे दिन आ गए हैं। राज्य सरकार की सख्ती के बाद ऐसे लोगों की नींद उड़ी हुई है जो गलत डॉक्यूमेंट दिखाकर सालों से नौकरी कर रहे हैं और मलाईदार पदों पर जमे बैठे हैं। प्रशासन ने जब पुराने मामलों की फाइलें खंगाली तो एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति ने जांच की तो चौंकाने वाले आंकड़े मिले। कुल 856 मामलों में से 294 प्रमाण पत्र पूरी तरह फर्जी पाए गए हैं। समिति की सिफारिश के बाद करीब 50 सरकारी कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से नौकरी से निकाल दिया गया है।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अभी भी 244 ऐसे मामले हैं जिनमें सेवा समाप्ति की कार्रवाई चल रही है। विभागों में फाइलें दौड़ रही हैं और हड़कंप मचा हुआ है। समिति ने साफ कर दिया है कि बख्शा किसी को नहीं जाएगा। आगामी 23 फरवरी को एक अहम बैठक होने वाली है जिसमें विभागों में अटके इन मामलों का हिसाब लिया जाएगा। साथ ही अधिकारियों और कर्मचारियों से जुड़े 85 अन्य लंबित मामलों पर भी सुनवाई होगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या विभाग वाकई में तेजी दिखाते हैं या फिर फाइलों को दबाने का पुराना खेल शुरू हो जाएगा। अक्सर देखा गया है कि जांच के नाम पर सालों साल निकल जाते हैं लेकिन इस बार सरकार के तेवर थोड़े सख्त नजर आ रहे हैं।
सिस्टम की लाचारी देखिए कि फर्जीवाड़ा पकड़ में आने के बाद भी कई लोग कुर्सी से चिपके रहने के लिए कानूनी दांवपेंच आजमा रहे हैं। अनुसूचित जाति जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के प्रमाण पत्रों में गड़बड़ी के 100 से अधिक मामलों में अधिकारियों और कर्मचारियों ने कोर्ट से स्टे ले लिया है। इनमें सबसे ज्यादा मामले स्कूल शिक्षा विभाग पंचायत व ग्रामीण विकास विभाग और कृषि विभाग जैसे बड़े महकमों के हैं। यानी जहां सबसे ज्यादा जिम्मेदारी है वहीं सबसे ज्यादा फर्जीवाड़ा हुआ है। शिकायतों के आधार पर ये मामले उच्च स्तरीय समिति को सौंपे जाते हैं लेकिन स्टे का सहारा लेकर दोषी अभी भी बच निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं।
राजधानी के सबसे प्रतिष्ठित पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में भी फर्जीवाड़े की आंच पहुंच गई है। यहां एक या दो नहीं बल्कि दर्जनभर से ज्यादा अधिकारी और कर्मचारी संदेह के घेरे में हैं। हाल ही में एनएसयूआई के जिला अध्यक्ष शांतनू झा ने इसके खिलाफ मोर्चा खोला है। उन्होंने विवि प्रबंधन और जाति सत्यापन समिति को लिखित शिकायत दी है। शांतनू का आरोप है कि ये लोग फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर सालों से नौकरी कर रहे हैं लेकिन शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही। विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है कि आखिर इन संदिग्ध कर्मचारियों को किसका संरक्षण प्राप्त है।
अब सबकी निगाहें 23 फरवरी की समीक्षा बैठक पर टिकी हैं। क्या प्रशासन इन फर्जी कागज वालों को बाहर का रास्ता दिखा पाएगा या फिर रसूख और कोर्ट स्टे के नाम पर यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला जाएगा। ईमानदार अभ्यार्थी आज भी इस आस में हैं कि कब यह गंदगी साफ होगी और हकदार को उसका हक मिलेगा।
लेखक के विषय में
मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
