सरकारी दावों के बीच मातृत्व की मौत! प्रसव पीड़ा में चली 2 KM पैदल, अस्पताल पहुंचते-पहुंचते खत्म हो गई दो जिंदगियां

सरकारी दावों के बीच मातृत्व की मौत! प्रसव पीड़ा में चली 2 KM पैदल, अस्पताल पहुंचते-पहुंचते खत्म हो गई दो जिंदगियां

जबलपुर/मुरैना: मध्य प्रदेश में सुरक्षित मातृत्व और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के दावों के बीच दो दर्दनाक घटनाओं ने सिस्टम की हकीकत उजागर कर दी है। एक तरफ मुरैना में अस्पताल पहुंचने से पहले ई-रिक्शा में प्रसव कराना पड़ा, तो दूसरी ओर जबलपुर में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने एक गर्भवती महिला और उसके अजन्मे बच्चे की जान ले ली है। इन घटनाओं ने सरकारी दावों और जमीनी सच्चाई के बीच की खाई को फिर सामने ला दिया है।

जबलपुर की 22 वर्षीय ममता कुशवाहा को प्रसव पीड़ा के दौरान ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, जिसकी कल्पना भी मुश्किल है। कॉलोनी में कीचड़ और बदहाल रास्तों के कारण कोई वाहन अंदर तक नहीं पहुंच सका। दर्द से तड़पती ममता को अपने परिजनों के सहारे करीब दो किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक पहुंचना पड़ा। सवाल यह है कि जब बुनियादी सड़क और आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधाएं ही उपलब्ध नहीं हैं, तो सुरक्षित मातृत्व के दावे कितने सार्थक हैं?

अस्पताल पहुंचने के बाद भी हालात नहीं सुधरे। गंभीर स्थिति में ममता को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर किया गया, लेकिन इलाज मिलने से पहले ही गर्भ में पल रहे शिशु की मौत हो गई और कुछ ही देर बाद ममता ने भी दम तोड़ दिया। यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल है जो समय पर मदद पहुंचाने में नाकाम साबित हुआ।

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मुरैना और जबलपुर की घटनाएं बताती हैं कि कागजों पर चल रही योजनाओं और जमीन पर उपलब्ध सुविधाओं में बड़ा अंतर है। जब गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़े और इलाज के अभाव में जान गंवानी पड़े, तब जिम्मेदार व्यवस्था की जवाबदेही तय होना जरूरी हो जाता है। वरना ऐसे हादसे केवल आंकड़ों में दर्ज होकर रह जाएंगे और सिस्टम की लापरवाही नई जिंदगियां निगलती रहेगी।

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