कोरबा पाम मॉल जमीन घोटाला: पुलिस ने फिर पेश किया खात्मा, हाईकोर्ट ने CJM को 4 हफ्ते में फैसला लेने का दिया अल्टीमेटम
NJV लीगल डेस्क। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित कोरबा पाम मॉल जमीन घोटाले मामले में एक बड़ा लीगल अपडेट सामने आया है। शासकीय दस्तावेजों में कूट रचना (फर्जीवाड़ा) की एफआईआर के मामले में कोरबा पुलिस की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। निचली अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद कोतवाली पुलिस ने चार्जशीट की जगह फिर से 'खात्मा रिपोर्ट' (Closure Report) पेश कर दी है। अब बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस मामले में दखल देते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) कोरबा को 4 सप्ताह के भीतर इस खात्मा प्रतिवेदन पर अंतिम निर्णय लेने का सख्त आदेश दिया है।
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का अहम निर्देश
इस हाई-प्रोफाइल मामले में दायर याचिका WPCR 221/2026 (अंकित सिंह बनाम अन्य) पर सुनवाई करते हुए माननीय मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस रवींद्र अग्रवाल की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने 22 फरवरी को अपना फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सीजेएम कोर्ट सभी पक्षों को विस्तार से और पूर्ण रूप से सुने, ताकि मामले से जुड़े कोई भी नए तथ्य हों, तो वे पारदर्शी रूप से सामने आ सकें। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया और खात्मा रिपोर्ट पर निर्णय लेने के लिए 4 हफ्ते का समय निर्धारित किया है।
पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात पुलिस का रवैया है, जो सीधे तौर पर कोर्ट के आदेशों की अवहेलना प्रतीत होता है। दरअसल, 20 फरवरी 2026 को ही सीजेएम कोरबा ने प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट श्री सत्यानंद प्रसाद द्वारा 10 नवंबर को दिए गए आदेश का हवाला देते हुए पुलिस को 30 दिनों के भीतर अभियोग पत्र (चार्जशीट) पेश करने का निर्देश दिया था। कोर्ट के इस आदेश में स्पष्ट रूप से 7 महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जांच करने को कहा गया था। लेकिन, पुलिस ने इन न्यायिक निर्देशों के बिल्कुल विपरीत जाकर मामले में जांच करने के बजाय 'खात्मा' पेश कर दिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पुलिस द्वारा गंभीरता से जांच नहीं की गई है।
एफआईआर कूट रचना की, जांच जमीन की स्थिति की
कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह मामला पुलिसिया जांच की दिशा पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है। कोतवाली थाना कोरबा में अपराध क्रमांक 1085/20 के तहत जो एफआईआर दर्ज की गई थी, वह मुख्य रूप से 'शासकीय दस्तावेजों में हेरफेर और कूट रचना' (Forgery of Government Documents) की गंभीर धाराओं के तहत थी। कायदे से जांच दस्तावेजों के फर्जीवाड़े, जाली हस्ताक्षरों या छेड़छाड़ पर केंद्रित होनी चाहिए थी। लेकिन इसके ठीक उलट, पुलिस की जांच की दिशा केवल 'जमीन की भौतिक स्थिति' का पता लगाने तक ही सीमित रह गई और मूल अपराध की जांच को दरकिनार कर दिया गया।
अब क्या होगा सीजेएम कोर्ट का अगला कदम?
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब पूरे प्रदेश के लीगल सर्किल की निगाहें कोरबा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत पर टिक गई हैं। अब देखना यह है कि:
क्या सीजेएम कोर्ट अपने ही 20 फरवरी 2026 के उस आदेश को पलट देगी, जिसमें उन्होंने 30 दिन में चार्जशीट पेश करने को कहा था, और पुलिस की इस खात्मा रिपोर्ट को स्वीकार कर लेगी?
या फिर न्यायालय के आदेश के विपरीत जाकर मनमानी जांच करने और बिना उचित जांच के खात्मा पेश करने के लिए पुलिस अधिकारियों को अवमानना (Contempt of Court) का नोटिस जारी किया जाएगा?
हाईकोर्ट के 4 हफ्ते के अल्टीमेटम के बाद अब गेंद कोरबा सीजेएम कोर्ट के पाले में है। सभी पक्षों को सुनने के बाद जो भी फैसला आएगा, वह इस बहुचर्चित जमीन घोटाले की दिशा तय करेगा।
