13 साल बाद आया फैसला: बिलासपुर के महेश स्वीट्स को हाईकोर्ट का तगड़ा झटका, अरारोट की बोरी में निकला था मक्का स्टार्च, 1 लाख का जुर्माना बरकरार

खाद्य विभाग ने 2011 में किया था निरीक्षण, अरारोट के नाम पर रखा था मक्का स्टार्च।

13 साल बाद आया फैसला: बिलासपुर के महेश स्वीट्स को हाईकोर्ट का तगड़ा झटका, अरारोट की बोरी में निकला था मक्का स्टार्च, 1 लाख का जुर्माना बरकरार

हाईकोर्ट की दो टूक- गुणवत्ता सही होना काफी नहीं, मिसब्रांडिंग अपने आप में एक अलग अपराध।

बिलासपुर। 13 साल बाद आए एक अहम फैसले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने खाद्य सुरक्षा नियमों की अनदेखी और 'मिसब्रांडिंग' के मामले में बिलासपुर के नामी 'महेश स्वीट्स' के संचालक को बड़ा झटका दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की डिवीजन बेंच ने एक दशक से अधिक समय से चले आ रहे इस मामले में महेश स्वीट्स के संचालक महेश चौकसे की आपराधिक अपील को सिरे से खारिज कर दिया है। 13 साल लंबी कानूनी जिरह के बाद अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि खाद्य सुरक्षा कानून के तहत उन पर लगाया गया 1 लाख रुपये का जुर्माना पूरी तरह वैध है और गलत लेबल वाला (मिसब्रांडेड) सामान रखना या इस्तेमाल करना कानूनन अपराध है।

 

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क्या है 13 साल पुराना यह पूरा विवाद?

 

यह मामला साल 2011 से शुरू हुआ था। 15 अक्टूबर 2011 को खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने बिलासपुर के तारबहार इलाके में स्थित महेश स्वीट्स की निर्माण इकाई (यूनिट) का औचक निरीक्षण किया था। जांच टीम को वहां 50 किलो का एक पैक बोरा मिला, जिस पर बड़े अक्षरों में 'अरारोट' लिखा हुआ था। अधिकारियों ने नियमानुसार उस बोरे से सैंपल लिया और जांच के लिए राज्य खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला (रायपुर) भेज दिया।

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अरारोट की जगह निकला 'मक्का स्टार्च'

 

31 अक्टूबर 2011 को रायपुर लैब से आई रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया। रिपोर्ट में बताया गया कि सैंपल गुणवत्ता के मानकों पर तो खरा है, लेकिन वह 'अरारोट' है ही नहीं। दरअसल, अरारोट के नाम पर बोरे में 'मक्का स्टार्च' (Corn Starch) भरा हुआ था। लेबल पर अरारोट लिखना और अंदर मक्का स्टार्च होना सीधे तौर पर 'मिसब्रांडिंग' का मामला था। इसी आधार पर 22 मई 2012 को संचालक पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था। 2019 में सत्र न्यायालय से भी अपील खारिज हुई, जिसके बाद 13 साल की इस कानूनी लड़ाई का अंत अब हाईकोर्ट के अंतिम फैसले से हुआ है।

 

हाईकोर्ट में बचाव पक्ष की दलीलें

 

महेश स्वीट्स के संचालक की ओर से तर्क दिया गया कि वह अरारोट या मक्का स्टार्च के व्यापारी नहीं हैं, बल्कि कटलेट जैसे खाद्य पदार्थ बनाते हैं। सैंपल अंतिम उत्पाद का नहीं, कच्चे माल का था। यह भी दलील दी गई कि जब माल की गुणवत्ता बिल्कुल सही थी और सिर्फ नाम का अंतर था, तो सजा नहीं मिलनी चाहिए। बचाव पक्ष ने रायपुर लैब की वैधता पर भी सवाल उठाए थे और कहा था कि जांच गाजियाबाद की सेंट्रल लैब में होनी चाहिए थी।

 

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: व्यापारी भी बराबर का जिम्मेदार

 

13 साल बाद इस मामले का पटाक्षेप करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कार्रवाई को पूरी तरह सही माना। चीफ जस्टिस की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि:

 रायपुर की राज्य प्रयोगशाला पूरी तरह से अधिकृत है, इसलिए उसकी रिपोर्ट शत-प्रतिशत वैध है।

 मिसब्रांडिंग एक अलग अपराध है। भले ही उत्पाद की गुणवत्ता अच्छी हो, लेकिन गलत नाम से खाद्य सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता।

 सिर्फ माल बनाने वाला (निर्माता) ही नहीं, बल्कि उस सामग्री का उपयोग करने वाले व्यापारी की भी पूरी जिम्मेदारी बनती है कि वह सही चीज का इस्तेमाल करे।

अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत का फैसला कानूनी रूप से बिल्कुल सही है और सैंपलिंग प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है। 13 साल बाद आए इस सख्त फैसले के साथ ही अदालत ने महेश स्वीट्स की अपील खारिज कर दी, जिससे उन्हें अब 1 लाख रुपये का जुर्माना भरना ही होगा।

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