सर्पदंश घोटाला: मर्ग और पीएम रिपोर्ट पर उठ रहे सवाल, फिर पुलिस-स्वास्थ्य विभाग पर मेहरबानी क्यों? ई ओ डब्लू /एसआईटी से जांच की मांग
बिलासपुर। सर्पदंश मामले में फर्जीवाड़े की कड़ियां लगातार जुड़ती जा रही हैं। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, मामले में परत-दर-परत नए तथ्य सामने आने लगे हैं। हाल ही में बिलासपुर और आसपास के कुछ गांवों से शुरू हुआ सर्पदंश घोटाला अब अन्य ब्लॉकों तक फैल चुका है। सूत्र बताते हैं कि यह घोटाला केवल बिलासपुर जिले तक सीमित न होकर पूरे प्रदेश का मसला बन गया है। यदि प्रदेश स्तर पर इसकी जांच हो, तो करोड़ों के वारे-न्यारे होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
घोटाले की गंभीरता को देखते हुए अब मामले की जांच आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) या विशेष जांच दल (SIT) से कराने की मांग उठने लगी है। स्थानीय पुलिस पर आरोप लग रहे हैं कि वह इस मामले को सुलझाने में नाकाम साबित हो रही है। वहीं, प्रशासनिक महकमे में ऊपर बैठे अधिकारी अपने मातहतों को बचाने की कवायद में लगे हुए हैं।
अब तक सर्पदंश मुआवजा घोटाले में सबसे ज्यादा सवाल राजस्व विभाग के मैदानी कर्मचारियों और अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठे हैं। लेकिन मुआवजा स्वीकृति की पूरी प्रक्रिया पर गौर करें, तो पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका की जांच भी उतनी ही जरूरी हो जाती है। महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने के बाद पुलिस और स्वास्थ्य महकमा अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।
छोटे कर्मचारियों को फंसाने का आरोप, लिपिक संघ ने खोला मोर्चा
इस पूरे फर्जीवाड़े में अब लिपिक संघ ने भी बड़े अधिकारियों की संलिप्तता उजागर कर दी है। संघ ने कलेक्टर को बाकायदा ज्ञापन सौंपकर दावा किया है कि घोटाले में उच्चाधिकारियों की भी पूरी मिलीभगत है। लिपिकों का आरोप है कि मामले को रफा-दफा करने और बड़े चेहरों को बचाने के लिए निचले स्तर के कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। संघ ने मांग रखी है कि केवल छोटे कर्मचारियों को फंसाने के बजाय, पूरे गिरोह को संरक्षण देने वाले बड़े अफसरों के खिलाफ विस्तृत जांच कर उन पर गाज गिरनी चाहिए।
मर्ग रिपोर्ट से ही तैयार होता है प्रकरण
राजस्व विभाग के पास मुआवजा आवेदन पुलिस की मर्ग रिपोर्ट और पोस्टमार्टम (पीएम) रिपोर्ट के आधार पर ही पहुंचता है। तय प्रक्रिया के अनुसार, थाने के टीआई मर्ग की जांच कर अपनी रिपोर्ट सीएसपी या एसडीओपी को सौंपते हैं। इसके बाद सीएसपी या एसडीओपी अंतिम खात्मा रिपोर्ट तैयार करते हैं। ऐसे में पुलिस विभाग के इन अधिकारियों के खिलाफ जांच या कार्रवाई नहीं होने से व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। यह जांच का विषय है कि मर्ग रिपोर्ट किस थाने में दर्ज हुई, उसे किस स्तर पर तैयार किया गया और दस्तावेजों का सत्यापन कैसे किया गया।
स्वास्थ्य विभाग की भूमिका और कथित फर्जी रिपोर्ट
सर्पदंश प्रकरण में स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली भी कटघरे में है। डॉ. प्रियंका सोनी से संबंधित कथित फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट का मामला सामने आ चुका है। इसके बावजूद अब तक जांच का मुख्य फोकस केवल राजस्व अमले पर ही केंद्रित रहा है। मर्ग और पीएम रिपोर्ट ही वह आधार हैं, जिन पर मुआवजे का पूरा प्रकरण टिका होता है। यदि ये रिपोर्ट ही संदेह के घेरे में हैं, तो रिपोर्ट तैयार करने वाले जांच से अछूते कैसे रह सकते हैं।
इस तरह पूरी होती है मुआवजे की प्रक्रिया
मुआवजा प्रक्रिया के तहत आवेदन मुख्य रूप से दो तरह से प्रस्तुत किया जाता है। पहले तरीके में पटवारी अपने प्रतिवेदन के साथ प्रकरण तैयार कर तहसीलदार को भेजता है। दूसरे तरीके में आवेदक स्वयं आवश्यक दस्तावेजों के साथ अपना आवेदन लगाता है। इन सभी दस्तावेजों में पुलिस की मर्ग रिपोर्ट और स्वास्थ्य विभाग की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अनिवार्य रूप से शामिल रहती हैं। इन्हीं दोनों रिपोर्ट के आधार पर तहसीलदार दस्तावेजों का परीक्षण करते हैं और मामलों की सुनवाई कर अपना प्रतिवेदन एसडीएम को भेजते हैं। इसके बाद एसडीएम यह प्रतिवेदन कलेक्टर या अपर कलेक्टर को भेजते हैं, जहां से अंत में मुआवजा स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी होती है।
सभी पक्षों की जांच की मांग
प्रक्रिया की इसी खामी और विभागीय मिलीभगत को देखते हुए छग कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ ने भी मामले की सघन जांच करवाने की मांग उठाई है। संघ का कहना है कि जब मर्ग और पीएम रिपोर्ट के आधार पर ही प्रकरण बनते हैं, तो मामले में किसी एक विभाग को निशाना बनाने के बजाय EOW या SIT जैसी स्वतंत्र एजेंसी से सभी पक्षों की विस्तृत जांच होनी चाहिए।
