वेट लॉस वाले इंजेक्शन से घटा लिया वजन, मगर छोड़ने पर हो जाएगा फिर वही हाल? पढ़ें क्या कहती है नई स्टडी

नई दिल्ली। आजकल वजन घटाने के लिए ओजेम्पिक, वेगोवी और मौनजारो जैसे इंजेक्शन पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बने हुए हैं। जो लोग मोटापे या बॉर्डरलाइन डायबिटीज से जूझ रहे हैं, उनके लिए ये दवाएं किसी चमत्कार से कम नहीं लगतीं हैं। इन्हें लेने के बाद भूख कम लगती है, खाने की क्रेविंग घट जाती है और वजन तेजी से कम होने लगता है, लेकिन सबसे बड़ा और मुश्किल सवाल यह है कि जब आप इन महंगे इंजेक्शनों को लेना बंद कर देते हैं, तो क्या होता है? बता दें, एक नई स्टडी ने इस सवाल का जवाब दिया है, जो आपके लिए थोड़ा चिंताजनक हो सकता है।

रिसर्च में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
'द बीएमजे' में प्रकाशित एक नए विश्लेषण में 9,341 वयस्कों के डेटा की जांच की गई, जिन्होंने वजन घटाने वाली दवाओं का उपयोग किया था। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह देखना था कि दवा बंद करने के बाद शरीर पर क्या असर पड़ता है।

रिसर्च में सामने आया कि दवा छोड़ने के बाद वजन दोबारा बढ़ने लगता है। औसतन, दवा बंद करने के बाद हर महीने लगभग 0.4 किलोग्राम वजन वापस आ जाता है। वहीं, अगर हम सेमाग्लूटाइड और टिरजेपटाइड जैसे नए और शक्तिशाली इंजेक्शनों की बात करें, तो वजन वापसी की यह रफ्तार और भी तेज है। इन इंजेक्शनों को छोड़ने के बाद लोगों का वजन लगभग 0.8 किलोग्राम प्रति माह की दर से बढ़ा। आंकड़े बताते हैं कि दवा छोड़ने के लगभग डेढ़ साल के भीतर, व्यक्ति का वजन वापस उसी स्तर पर पहुंच जाता है, जहां से उसने शुरुआत की थी।

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सिर्फ वजन ही नहीं, लौट आता है बीमारियों का भी खतरा
जब तक मरीज ये दवाएं लेते हैं, न केवल उनका वजन कम होता है, बल्कि ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल में भी सुधार होता है, लेकिन अध्ययन से पता चला है कि दवा रोकने के बाद ये सभी हेल्थ मार्कर्स भी बिगड़ने लगते हैं। इलाज बंद होने के एक साल के भीतर शुगर और फैट का स्तर फिर से बढ़ने लगता है। इसका मतलब है कि इन दवाओं से मिले हेल्थ बेनिफिट्स परमानेंट नहीं होते, बल्कि ये तब तक ही रहते हैं जब तक दवा शरीर में मौजूद है।

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वापस क्यों बढ़ जाता है वजन?
वैज्ञानिकों का मानना है कि मोटापा केवल कैलोरी का खेल नहीं है, बल्कि यह एक बायोलॉजिकल सिस्टम है। जब हम तेजी से वजन घटाते हैं, तो हमारा दिमाग इसे 'भुखमरी' या खतरे के रूप में देखता है।

नतीजतन, शरीर बचाव की मुद्रा में आ जाता है। भूख लगने वाले हार्मोन बढ़ जाते हैं और शरीर कैलोरी खर्च करना कम कर देता है। ये इंजेक्शन भूख को दबाकर रखते हैं, लेकिन जैसे ही आप इन्हें लेना बंद करते हैं, शरीर की पुरानी प्रणाली फिर से सक्रिय हो जाती है और खोए हुए वजन को वापस लाने की पूरी कोशिश करती है। इसे 'अडाप्टिव थर्मोजेनेसिस' (Adaptive Thermogenesis) कहा जाता है।

लाइफस्टाइल में बदलाव कितना जरूरी?
अध्ययन में एक महत्वपूर्ण तुलना भी की गई। जो लोग डाइट और एक्सरसाइज के जरिए वजन कम करते हैं, उनका वजन भी दोबारा बढ़ सकता है, लेकिन उसकी रफ्तार बहुत धीमी (लगभग 0.1 किलोग्राम प्रति माह) होती है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि लाइफस्टाइल प्रोग्राम में लोग खान-पान को मैनेज करना और खुद पर नियंत्रण रखना सीखते हैं। वहीं, इंजेक्शन भूख को आर्टिफिशियल रूप से दबा देते हैं, जिससे मरीज को खुद से कोशिश नहीं करनी पड़ती। जब दवा का असर खत्म होता है, तो पुरानी आदतें और भूख दोनों वापस आ जाती हैं।

एक 'क्रॉनिक कंडीशन' है मोटापा
इस रिसर्च का सबसे बड़ा नतीजा यह है कि मोटापे को बुखार जैसी समस्या नहीं समझा जाना चाहिए जो एक बार दवा लेने से ठीक हो जाए। यह डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर की तरह एक 'क्रॉनिक कंडीशन' है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन दवाओं का असर बनाए रखने के लिए लंबे समय तक इलाज की जरूरत हो सकती है। भारत जैसे देश में, जहां ये इंजेक्शन काफी महंगे हैं, लंबे समय तक इनका उपयोग करना हर किसी के लिए संभव नहीं है। इसलिए, केवल दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय, जीवनशैली में बदलाव और लंबे समय तक चलने वाली रणनीति अपनाना ही सेहत के लिए बेहतर विकल्प है।

 

लेखक के विषय में

मनीशंकर पांडेय Picture

मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।

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