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भारत को सीधा सैन्य खतरा नहीं, लेकिन महंगे कच्चे तेल और 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा ने बढ़ाई चिंता; एक्स पर ट्रेंड हुआ गॉड ब्लेस इंडिया
नई दिल्ली. ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच मार्च 2026 में शुरू हुए भीषण युद्ध और ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई की मौत के बाद पूरी दुनिया की नजरें मध्य पूर्व पर टिकी हैं। इस महायुद्ध में भारत सीधे तौर पर शामिल नहीं है और न ही देश को कोई प्रत्यक्ष सैन्य खतरा है। भारत ने अब तक अपना कूटनीतिक रुख तटस्थ रखा है। हालांकि, युद्ध लंबा खिंचने की स्थिति में भारत को बड़े आर्थिक झटकों और खाड़ी देशों में रह रहे अपने नागरिकों की सुरक्षा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के विशेषज्ञों का भी मानना है कि ग्लोबल सप्लाई चेन पर इस युद्ध का कितना असर होगा, यह इसके लंबा खिंचने पर निर्भर करेगा।
अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार: महंगा होगा तेल, बढ़ सकती है महंगाई
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती कच्चे तेल की कीमतें हैं। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा सऊदी अरब और यूएई जैसे मध्य पूर्व के देशों से आता है।
सप्लाई चेन में बाधा: कच्चे तेल की आवाजाही के सबसे अहम रास्ते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें 82 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं।
रुपये और कैड पर दबाव: तेल महंगा होने से घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ने की आशंका है। इसके साथ ही भारतीय रुपये की कीमत में गिरावट आ सकती है और चालू खाता घाटा 0.4 से 0.5 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।
व्यापार और निवेश: खाड़ी क्षेत्र में भारत का लगभग 4.5 बिलियन डॉलर का निर्यात प्रभावित होने की आशंका है। विदेशी निवेश घटने से शेयर बाजार में भी अस्थिरता देखी जा रही है।
खाड़ी देशों में रह रहे 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा प्राथमिकता
आर्थिक मोर्चे के अलावा सबसे बड़ी चिंता खाड़ी देशों में काम कर रहे 90 लाख से अधिक भारतीय नागरिकों की सुरक्षा है। ईरान द्वारा इन देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और नागरिक क्षेत्रों पर किए जा रहे ड्रोन और मिसाइल हमलों ने खतरे की घंटी बजा दी है।भारत सरकार पूरी तरह अलर्ट पर है। विदेश मंत्री लगातार मध्य पूर्व के समकक्षों से संपर्क साधे हुए हैं। कूटनीतिक स्तर पर भारत ने न तो अमेरिका और न ही इजरायल की आलोचना की है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल ही में इजरायली प्रधानमंत्री से इस हालात पर चर्चा की है।
रेमिटेंस पर असर: खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय हर साल लगभग 135 बिलियन डॉलर स्वदेश भेजते हैं। युद्ध से वहां की अर्थव्यवस्था चरमराने पर इस रेमिटेंस में भारी कमी आ सकती है।
सोशल मीडिया पर क्यों ट्रेंड कर रहा है गॉड ब्लेस यू इंडिया?
युद्ध के इस तनावपूर्ण माहौल के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर गॉड ब्लेस यू इंडिया तेजी से ट्रेंड कर रहा है। इसके पीछे कई कारण सामने आए हैं: सभ्यता की लड़ाई का नैरेटिव: कई यूजर्स इस युद्ध को सभ्यता बनाम कट्टरपंथी बर्बरता के तौर पर देख रहे हैं। एक वायरल पोस्ट में लिखा गया कि गॉड ब्लेस इजरायल, गॉड ब्लेस अमेरिका और गॉड ब्लेस इंडिया। 1.45 अरब भारतीयों की प्रार्थनाएं इजरायली भाई बहनों के साथ हैं। भारत के नए युग की शुरुआत: कुछ विदेशी और भारतीय यूजर्स का मानना है कि अमेरिका के कमजोर पड़ने की स्थिति में अब वैश्विक मंच पर भारत का युग शुरू हो रहा है। हालाँकि, इस हैशटैग में युद्ध से इतर होली की शुभकामनाएँ, फिल्मों के प्रमोशन और आम देशभक्ति से जुड़े सकारात्मक संदेश भी भारी मात्रा में शेयर किए जा रहे हैं।कुल मिलाकर, भारत फिलहाल सैन्य रूप से पूरी तरह सुरक्षित और कूटनीतिक रूप से संतुलित है, लेकिन वैश्विक पटल पर हो रही इस उथल पुथल के आर्थिक झटकों से बचने के लिए सरकार को ठोस रणनीति अपनानी होगी।
लेखक के विषय में
मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
