नर शावक की मौत पर भारी पड़ा वीआईपी मूवमेंट, हफ्ते भर जंगल में सड़ती रही लाश और चैन की नींद सोते रहे वन अफसर

नर शावक की मौत पर भारी पड़ा वीआईपी मूवमेंट, हफ्ते भर जंगल में सड़ती रही लाश और चैन की नींद सोते रहे वन अफसर

बिलासपुर। अचानकमार टाइगर रिजर्व (एटीआर) के कोर एरिया में एक दो साल के नर बाघ शावक का सड़ा हुआ शव मिलने से खलबली मच गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस नन्हे शावक की मौत करीब 6 दिन पहले ही हो गई थी लेकिन बिलासपुर में मुख्यमंत्री के 26 जनवरी के कार्यक्रम और वीआईपी मूवमेंट के चलते अफसर इस खबर को दबाए बैठे रहे। जब लाश पूरी तरह गल गई और हड्डियों का ढांचा दिखने लगा तब जाकर महकमे ने इसकी पुष्टि की।

क्या आपसी संघर्ष की थ्योरी सिर्फ एक बहाना है

एटीआर के अफसर इस मौत को आपसी संघर्ष का मामला बता रहे हैं। लेकिन जानकारों का कहना है कि महज 2 साल का बच्चा बाघ किसी बड़े बाघ से खूनी संघर्ष कैसे कर सकता है अक्सर देखा गया है कि छोटे बच्चों के साथ उनकी मां (शेरनी )साथ में रहती है ऐसे में संघर्ष होने की स्थिति में शेरनी अपने शावक का बचाव करती है ऐसे में संघर्ष कि थ्योरी सटीक नहीं बैठती जिसमें नन्हे शावक की जान ही चली जाए। 6 दिनों तक मौत को छिपाकर रखना और फिर उसे कुदरती लड़ाई बताना दाल में काला होने का इशारा कर रहा है। चर्चा है कि सीएम के बिलासपुर कार्यक्रम की चमक फीकी न पड़े इसलिए राष्ट्रीय पशु की मौत को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।

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बंदूकधारियों की सैरगाह बना अचानकमार

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टाइगर रिजर्व की सुरक्षा की पोल तो एक महीने पहले ही खुल गई थी जब 4 लोग अवैध रूप से बंदूक लेकर जंगल के प्रतिबंधित इलाके में घुस गए थे। बताया जा रहा है कि इनमें एक सत्ताधारी दल के कद्दावर मंत्री का रसूखदार रिश्तेदार भी शामिल था। जब वीआईपी लोग हथियारों के साथ खुलेआम घूम रहे हों तो फिर बाघों की सुरक्षा का क्या ही कहना। टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स और बीट गार्ड्स को हफ्ते भर तक लाश की दुर्गंध तक नहीं आई जिससे साफ है कि मैदानी कर्मचारी फील्ड के बजाय दफ्तरों में ही ड्यूटी बजा रहे हैं।

पुराना रिकॉर्ड: बाघों के लिए काल बना एटीआर

अचानकमार में वन्यजीवों की मौत का सिलसिला पुराना है। ठीक एक साल पहले 25 जनवरी को भी लमनी रेंज में एक बाघिन की मौत हुई थी। उससे पहले कन्हैया नाम के बुजुर्ग बाघ की मौत ने भी सिस्टम पर सवाल खड़े किए थे। यही नहीं पिछले कुछ महीनों में हाथियों के छोटे बच्चों की मौत और उनके शवों को आनन-फानन में ठिकाने लगाने के मामले भी सामने आ चुके हैं। आंकड़ों की बात करें तो एटीआर में अब सिर्फ 17 बाघ बचे हैं जो साय सरकार की नीतियों और वन प्रबंधन की विफलता का जीता जागता सबूत है।

हाथ-पैर फूले तो प्रेस नोट का लिया सहारा

बाघ का शव कक्ष क्रमांक 120 आरएफ में इस कदर सड़ चुका था कि खाल जमीन से चिपक गई थी। कैमरा ट्रैप की चिप बदली गई तो उसमें दो और बाघ घायल नजर आए हैं जिनका अब तक कोई सुराग नहीं मिला है। इस पूरे मामले पर यूआर गणेश डिप्टी डायरेक्टर एटीआर ने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही मौत की असली वजह पता चलेगी। इसके बाद उन्होंने कुछ भी कहने से मना कर दिया और कहा कि जो जानकारी दी गई है उसे प्रेस नोट में देख लें। एक विज्ञप्ति पूर्व में जारी की गई इसके बाद पुनः दूसरी विज्ञप्ति जारी की गई जो चर्चा का विषय है। 

सवालों के घेरे में वन महकमा

जानकार पूछ रहे हैं कि क्या एटीआर अब सिर्फ शिकारियों और रसूखदारों के पिकनिक मनाने की जगह रह गया है। 2 साल का शावक जिसे मां की सुरक्षा में होना चाहिए था वह आखिर कैसे मरा। इस मामले में वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट की धाराओं के तहत अब तक क्या कार्रवाई हुई और किसकी लापरवाही से राष्ट्रीय संपत्ति का यह नुकसान हुआ इसका जवाब देने वाला फिलहाल कोई नहीं है।

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