प्रेस क्लब गृह निर्माण समिति में 'अपनों' को बचाने का खेल: पूर्व अध्यक्षों पर FIR के आदेश को वर्तमान अध्यक्ष ने दबाया, अब सीमांकन के विरोध ने खोली पोल

प्रेस क्लब गृह निर्माण समिति में 'अपनों' को बचाने का खेल: पूर्व अध्यक्षों पर FIR के आदेश को वर्तमान अध्यक्ष ने दबाया, अब सीमांकन के विरोध ने खोली पोल

ख़ास बातें:

 

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  • सहकारिता विभाग के आदेश को समिति ने रद्दी की टोकरी में डाला।
  • सिविल लाइन पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी उठे सवाल, महीनों से दबाकर बैठी है फाइल।

 

जगत पहल विशेष । समाज की हर छोटी-बड़ी खामियों पर बेबाकी से कलम चलाने वाले जब खुद कटघरे में हों, तो वे मैनेजमेंट के किस स्तर तक जा सकते हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण प्रेस क्लब गृह निर्माण समिति बन गई है। समिति में इन दिनों 'तुम मुझे बचाओ, मैं तुम्हें बचाऊंगा' का खेल जोरों पर चल रहा है।

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हालत यह है कि पूर्व अध्यक्षों के कार्यकाल में हुए घोटालों की जांच पूरी हो चुकी है, दोष सिद्ध हो चुका है, लेकिन वर्तमान अध्यक्ष  अपने करीबियों को बचाने के लिए सहकारिता विभाग के आदेशों को ही डकार गए हैं।

 

नोटिस को ऐसे दबाया, जैसे गधे के सिर से सींग

 

करीब एक माह पहले सहकारिता विभाग ने वर्तमान गृह निर्माण समिति के अध्यक्ष संजीव पांडे को  पत्र जारी किया था। इसमें स्पष्ट निर्देश थे कि पूर्व अध्यक्ष  और एक अन्य पदाधिकारी  के कार्यकाल में भारी अनियमितताएं जांच में साबित हो चुकी हैं, लिहाजा इनके खिलाफ तत्काल पुलिस में अपराध दर्ज कराया जाए। लेकिन, न्याय और पारदर्शिता का चोला ओढ़ने वाली समिति ने इस आदेश को ऐसे गायब कर दिया जैसे गधे के सिर से सींग। एफआईआर तो दूर, समिति ने मामले पर ऐसी चुप्पी साधी मानो उनके मुंह में दही जम गया हो।

 

पुलिस भी मेहरबान: पूर्व प्रशासक का पत्र भी खा गया था धूल

 

यह पहला मौका नहीं है जब इस मामले को रफा-दफा करने की कोशिश हुई हो। अगर पुराने पन्ने पलटें तो, पूर्व में नियुक्त प्रशासक मंजू पांडेय द्वारा श्री बाजपेई को नियुक्त किया गया था। श्री बाजपेई ने नियम-कायदों का पालन करते हुए बाकायदा सिविल लाइन थाने और प्रशासन को अपराध दर्ज करने के लिए पत्र लिखा था। लेकिन सिविल लाइन पुलिस की सुस्ती देखिए! महीनों बीत गए, शायद वह फाइल दीमकों का निवाला बन गई, क्योंकि पुलिस ने आज तक कोई कार्रवाई नहीं की।

अब प्रशासन के सब्र का बांध भी टूट रहा है। विभाग ने हारकर एक बार फिर सीधे पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के लिए पत्र लिखा है। लेकिन गृह निर्माण समिति है कि अपने 'खासमखास' पूर्व अध्यक्षों पर आंच नहीं आने देना चाहती।

 

सीमांकन के विरोध ने करा दी फजीहत

 

समिति की यह मनमानी अब उसी के गले की हड्डी बन गई है। हाल ही में जब जमीन के सीमांकन की बारी आई, तो समिति ने इसका पुरजोर विरोध किया। सवाल यह उठता है कि आखिर सीमांकन से डर कैसा? क्या जमीन के अंदर कोई और 'खजाना' या 'घोटाला' दबा है जिसके बाहर आने का डर सता रहा है? इस विरोध ने समिति को चारों तरफ से घेर लिया है।

 

अब उठ रहे हैं बगावत के सुर

 

लगातार विवादों और धांधलियों को बचाने की इस जिद ने समिति के भीतर ही बगावत के बीज बो दिए हैं। कल तक जो अध्यक्ष के गुणगान करते नहीं थकते थे, आज उसी गुट में फूट पड़ गई है। वर्तमान अध्यक्ष के कई करीबी पत्रकार अब दबी जुबान से ही सही, लेकिन इस भ्रष्ट कार्यप्रणाली के खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं। अंदरखाने की खबर यह है कि ये असंतुष्ट सदस्य अब दूसरे धड़े का समर्थन करने लगे हैं।

 

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