सुप्रीम कोर्ट के जज की टिप्पणी: देश में असहमति जताने की जगह हो रही कम, कहा- विरोध करने पर छात्र भेजे जा रहे जेल, जमानत भी नहीं

सुप्रीम कोर्ट के जज की टिप्पणी: देश में असहमति जताने की जगह हो रही कम, कहा- विरोध करने पर छात्र भेजे जा रहे जेल, जमानत भी नहीं

नई दिल्ली/भोपाल।  देश में अलग-अलग विचारों और असहमति जताने के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि अपने अधिकारों की मांग को लेकर प्रदर्शन करने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा रहा है। उन्हें आसानी से जमानत तक नहीं मिल पाती। यह चिंता सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयन ने जाहिर की है।

शनिवार को भोपाल स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में एक लेक्चर के दौरान जस्टिस भुयन ने देश में असहमति के घटते दायरे पर अपने विचार रखे। अदालतों के रवैये का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अगर किसी मामले में छात्रों को जमानत मिल भी जाती है, तो उनके ऊपर ऐसी सख्त शर्तें थोप दी जाती हैं, जो उनकी निजी आजादी को गंभीर रूप से सीमित कर देती हैं।

**प्रदर्शन और इस्तीफे के बीच आया बयान**

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जस्टिस भुयन की यह टिप्पणी ऐसे वक्त में आई है जब देश की राजधानी में हाल ही में एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला है। कॉकरोच जनता पार्टी के लंबे प्रदर्शन के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद ही दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी प्रदर्शन को समाप्त करने की घोषणा की गई।

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गौरतलब है कि करीब एक महीने तक चले इस विरोध प्रदर्शन में 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। इस टकराव में कई प्रदर्शनकारी और कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे। इस पूरे राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में सुप्रीम कोर्ट के जज का यह बयान मौजूदा हालात की एक तस्वीर पेश करता है।

**वैध तरीके भी अब बन रहे अपराध**

कानूनी प्रक्रियाओं पर बात करते हुए जस्टिस भुयन ने अपने लेक्चर में कहा कि असहमति जताने के जो वैध तरीके हैं, उन्हें भी अब अपराध बना दिया जाता है। उन्होंने आम तौर पर अदालतों द्वारा जमानत न दिए जाने और जमानत देने के बाद भी लोगों पर सेल्फ-सेंसरशिप लगाए जाने के बढ़ते चलन पर अपनी चिंता साझा की।

अपने संबोधन में उन्होंने एक उदाहरण देते हुए गंगा नदी के बीच नाव पर इफ्तार पार्टी करने वाले कुछ युवाओं को जमानत न दिए जाने के फैसले पर भी सवाल उठाया।

जस्टिस भुयन के इस बयान के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। आम लोग और कानून के जानकार इसे भारत में असहमति की आवाजों को सीमित किए जाने की तस्दीक मान रहे हैं। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में अलग-अलग विचारों का होना और प्रदर्शन करना एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन मौजूदा समय में कानूनी प्रक्रिया और जमानत की मुश्किलों ने इस पर कई सवाल खड़े कर

दिए हैं।

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