जल संसाधन विभाग में 5576 करोड़ का निविदा महाघोटाला: 2524 करोड़ का काम पाने वाली कंपनी का अनुभव प्रमाण पत्र फर्जी निकला, रातों रात 2 मिनट में खोली गई वित्तीय बोली
एल 1 और एल 2 में महज एक फीसदी का अंतर • शर्तों को मरोड़कर अपात्र कंपनियों को पात्र बनाने का खेल
रायपुर। छत्तीसगढ़ जल संसाधन विभाग में 5576 करोड़ रुपये की तीन मेगा निविदाओं में भारी गड़बड़ी और विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत का एक बहुत बड़ा मामला सामने आया है। सरकार एक तरफ किसानों की सिंचाई क्षमता बढ़ाने के लिए खजाना खोल रही है, वहीं विभाग के कुछ आला अधिकारी अपात्र कंपनियों को ठेका देने के लिए नियमों को ताक पर रख रहे हैं। विभाग की तीन बड़ी परियोजनाओं सिकासार कोडार लिंक नहर, मटनार देउरगांव उद्वहन बैराज और मोहमेला सिरपुर बैराज की एल 1 राशि लगभग 4726 करोड़ रुपये है, जो 18 फीसदी जीएसटी के बाद करीब 5576 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है। दस्तावेजों की पड़ताल से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि सबसे बड़ी 2524 करोड़ रुपये की सिकासार कोडार निविदा में मेसर्स दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड को जिस अनुभव प्रमाण पत्र के आधार पर योग्य ठहराया गया था, वह पूरी तरह से गलत साबित हुआ है। जारीकर्ता संस्था ने ही उसे संशोधित कर कंपनी की हिस्सेदारी 100 फीसदी से घटाकर 65 फीसदी कर दी है। बावजूद इसके, अधिकारियों ने रातों रात निविदाएं खोलकर अपात्र कंपनियों को करोड़ों का काम सौंपने की जमीन तैयार कर ली है।
नींव खिसकी फिर भी खड़ी कर दी 2524 करोड़ की इमारत
गरियाबंद जिले की पैरी परियोजना के तहत सिकासार से कोडार जलाशय तक लिंक नहर पाइपलाइन के लिए 13 मई 2026 को निविदा जारी हुई थी। इस अकेले काम की अनुमानित लागत 2549 करोड़ रुपये थी। 27 जुलाई 2026 को दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड भोपाल 2524 करोड़ रुपये की दर के साथ एल 1 बन गई। जबकि एनसीसी लिमिटेड 2600 करोड़ रुपये के साथ एल 2 रही। विभाग के अनुमोदन प्रस्ताव में यह दर्ज है कि कंपनी तकनीकी और वित्तीय दोनों शर्तें पूरी करती है। कंपनी ने मध्य प्रदेश जल निगम मर्यादित नीमच का गांधी सागर 2 योजना का जो अनुभव प्रमाण पत्र लगाया था, उसके बारे में शिकायत थी कि वह जॉइंट वेंचर का है। प्रमुख अभियंता कार्यालय ने 21 जुलाई को नीमच से सत्यापन मांगा और महज एक दिन में 22 जुलाई को शिकायत खारिज कर दी।
असली खेल 1 सितंबर 2026 को उजागर हुआ, जब मध्य प्रदेश जल निगम के जनरल मैनेजर ने पत्र क्रमांक 30442 के जरिए संशोधित प्रमाण पत्र जारी किया। इसमें साफ लिखा है कि इस काम में दिलीप बिल्डकॉन की हिस्सेदारी केवल 65 फीसदी और स्काईवे इंफ्राप्रोजेक्ट्स की 35 फीसदी है। निविदा नियम के अनुसार कंपनी को 1274 करोड़ रुपये के समान प्रकृति के कार्य का अनुभव चाहिए था। यदि 1400 करोड़ के कुल काम का 65 फीसदी निकाला जाए तो यह आंकड़ा सिर्फ 910 करोड़ रुपये ही बनता है। इसके बावजूद अधिकारियों ने आंखें मूंदकर कंपनी को पात्र घोषित कर दिया।
रात 10 बजकर 16 मिनट पर खुली निविदा, दो मिनट में मूल्यांकन
विभागीय जल्दबाजी और गड़बड़ी का सबसे बड़ा प्रमाण ई प्रोक्योरमेंट पोर्टल से निकली शीट है। सिकासार कोडार निविदा की वित्तीय बोली 27 जुलाई 2026 को रात 22 बजकर 16 मिनट पर खोली गई और रात 22 बजकर 18 मिनट पर इसका मूल्यांकन भी पूरा कर लिया गया। ढाई हजार करोड़ का मूल्यांकन मात्र दो मिनट में कर दिया गया। निविदा खोलने, डिक्रिप्ट करने और मूल्यांकन करने की पूरी प्रक्रिया कार्यपालन अभियंता निविदा प्रकोष्ठ अरविंद कुमार कोसले द्वारा की गई। प्रतिस्पर्धा खत्म करने के लिए 23 जुलाई की रात 10 बजे ईमेल भेजकर ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर्स और रित्विक प्रोजेक्ट्स को अपात्र घोषित किया गया। इसके बाद एल 1 और एल 2 के बीच अंतर महज 76 करोड़ का रह गया।
ऋणात्मक बिड कैपेसिटी वाली कंपनी की भी खोल दी दर
मटनार देउरगांव बैराज की 1636 करोड़ रुपये की निविदा क्रमांक 190888 में तो और भी गंभीर खेल हुआ। रित्विक प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड ने 15 जून 2026 को निविदा जमा करते समय अपनी बिड कैपेसिटी 4229 करोड़ रुपये दिखाई। लेकिन कंपनी ने अरुणाचल प्रदेश में मिले 14445 करोड़ रुपये के डैम और हाइड्रो मैकेनिकल कार्य को दस्तावेजों में छिपा लिया। अगर इस काम की राशि को घटाया जाए, तो कंपनी की बिड कैपेसिटी माइनस 10216 करोड़ रुपये हो जाती है। बिड कैपेसिटी माइनस में होने के बावजूद अधिकारियों ने कंपनी की दर खोल दी। स्थानीय जानकारों का तो यहां तक कहना है कि देउरगांव बैराज के जलभराव से इंद्रावती नदी पर बने तोकापाल और जगदलपुर शहर के एनीकट डूब जाएंगे, जिन पर सरकार पहले ही 100 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। मोहमेला सिरपुर बैराज निविदा में भी ऐसा ही हुआ, जहां ओम मेटल्स इंफ्राप्रोजेक्ट्स का टर्नओवर महज 592 करोड़ रुपये है जबकि निविदा के लिए 1149 करोड़ रुपये की जरूरत थी। विभाग ने खुद कंपनी को अयोग्य लिखा, फिर भी वह एल 1 बन गई।
14 अधिकारियों पर मिलीभगत का आरोप, जांच की मांग
भरतपुर सोनहत के पूर्व विधायक गुलाब कमरो ने 6 अक्टूबर 2026 को मुख्य सचिव और जल संसाधन विभाग के सचिव को पत्र क्रमांक 180 भेजकर तीनों निविदाओं को तुरंत निरस्त करने की मांग की है। उन्होंने अपनी शिकायत में प्रमुख अभियंता जितेन्द्र नेताम, मामले के मास्टरमाइंड आई ए सिद्दीकी , मुख्य अभियंता निविदा प्रकोष्ठ आबताब आलम, संजय गुप्ता, अरविंद कोसले और मक्सी कुजूर सहित 14 अधिकारियों के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच और निलंबन की मांग की है। आरोप है कि ईमानदार अधिकारियों को दरकिनार किया गया और जो वित्त नियंत्रक हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं थे, उन्हें छुट्टी पर दिखा दिया गया।
शर्तों में बदलाव कर सरकारी खजाने को भारी जोखिम
ठेकेदारों को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए निविदा की शर्तों में बड़ा फेरबदल किया गया। मोबिलाइजेशन और मशीनरी एडवांस के नियमों को शिथिल कर दिया गया है। पहले इन एडवांस राशियों पर ब्याज लगता था और मशीनरी का सरकार के पक्ष में हाइपोथिकेशन अनिवार्य था। अब 50 करोड़ रुपये तक के एडवांस को ब्याज मुक्त कर दिया गया है और हाइपोथिकेशन की शर्त हटा दी गई है। अगर कल को ठेकेदार काम बीच में छोड़ दे, तो सरकारी खजाने की भरपाई के लिए कोई सुरक्षित उपाय नहीं है।
अनुभव 1000 एमएम का और काम दे दिया 3000 एमएम का
तकनीकी शर्तों के साथ भी जमकर खिलवाड़ हुआ। निविदा दस्तावेजों के क्लॉज 1.2 में एम एस पाइप बिछाने के लिए 1000 एमएम व्यास की पाइपलाइन का अनुभव मांगा गया था, जबकि हकीकत में यह काम 3000 एमएम व्यास की पाइपलाइन का है। इंजीनियरिंग विशेषज्ञों के अनुसार 3000 एमएम के काम में वेल्डिंग, डिजाइन और हाइड्रो टेस्टिंग की जटिलताएं कई गुना बढ़ जाती हैं। इतना बड़ा काम 1000 एमएम का अनुभव रखने वाली कंपनी को देना बड़े खतरे को दावत देने जैसा है।
लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू तक पहुंचे दस्तावेज
इस पूरे मामले की शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्यमंत्री सचिवालय और ईओडब्ल्यू तक पहुंच चुकी है। सूत्रों के मुताबिक राज्य सरकार जल्द ही इस मामले में महालेखाकार से विशेष अंकेक्षण करा सकती है। विभाग के भीतर ही जिन अधिकारियों ने इस गड़बड़ी पर लिखित आपत्ति जताई थी, उनके बयान भी दर्ज किए जा सकते हैं। आने वाले दिनों में जल संसाधन विभाग के कई बड़े अधिकारियों पर गाज गिरना तय माना जा रहा है।
