सिकासार परियोजना: 2500 करोड़ के टेंडर में DVL के अनुभव प्रमाण पत्र पर बवाल, अधिकारियों और नए मंत्री की भूमिका....... पढ़े 

सिकासार परियोजना: 2500 करोड़ के टेंडर में DVL के अनुभव प्रमाण पत्र पर बवाल, अधिकारियों और नए मंत्री की भूमिका....... पढ़े 

रायपुर। छत्तीसगढ़ की बहुचर्चित सिकासार परियोजना का 2500 करोड़ रुपये का टेंडर भारी विवादों के घेरे में आ चुका है। पूरा गोलमाल दिलीप बिल्डकॉन DVL कंपनी को बांटे गए अनुभव प्रमाण पत्र के इर्द-गिर्द घूम रहा है। इस कागजी बाजीगरी ने प्रशासनिक गलियारों से लेकर राजनीतिक महकमे तक हड़कंप मचा दिया है। जनप्रतिनिधि पहले ही इस समूची प्रक्रिया की खामियों की तरफ इशारा कर चुके हैं। बावजूद इसके, पूरी व्यवस्था जानबूझकर आंखें मूंदे बैठी रही और चहेती कंपनी को फायदा पहुंचाने का खेल चलता रहा।

विभागीय सूत्रों के मुताबिक, गड़बड़ी की पटकथा गांधी सागर प्रोजेक्ट से शुरू होती है। वहां DVL और SIPL का जॉइंट वेंचर काम कर रहा था। उसी पुराने प्रोजेक्ट को आधार बनाते हुए DVL के हाथों में नया अनुभव प्रमाण पत्र थमा दिया गया। आरोप बेहद गंभीर हैं कि नियमों को ताक पर रखकर DVL के खाते में तय अनुपात से कहीं ज्यादा अनुभव जोड़ दिया गया। सिर्फ कागजों पर कंपनी का कद बढ़ाकर सिकासार के इतने बड़े टेंडर में उसकी एंट्री पक्की कराई गई। आखिर किस दबाव में अधिकारियों ने कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाया, यह गहरी जांच का विषय है।

जल संसाधन विभाग के आला अधिकारियों की कार्यप्रणाली पूरी तरह संदेह के दायरे में है। जब इस गड़बड़झाले पर मध्यप्रदेश के एमडी चौधरी से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने कहा कि मामले में जरूरी कार्रवाई के निर्देश दे दिए गए हैं। और पूरी प्रक्रिया में सुधार की बात कही इधर धरातल पर सच्चाई इसके विपरीत है। निर्देश जारी होने की बातों के बीच अब में किसी भी अधिकारी या ठेका कंपनी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। ऐसा लग रहा है मानो फाइलों की जांच सिर्फ दिखावे के लिए हो रही है और बैकडोर से मामले को रफा-दफा करने की तैयारी चल रही है।

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इस टेंडर घोटाले की आंच अब सत्ता के शीर्ष तक जा पहुंची है। रायपुर सीएम ऑफिस में जमे रसूखदार अफसर और हाल ही में कुर्सी पर बैठे नए-नवेले मंत्री की भूमिका भी शक के दायरे में आ गई है। कहा जा रहा है कि ऊपर के इशारे के बिना 2500 करोड़ रुपये के टेंडर में इतनी बड़ी हेराफेरी मुमकिन ही नहीं है। विभागीय साठगांठ और अफसरों की मनमानी के चलते मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़, दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की छवि को भारी नुकसान पहुंच रहा है।

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अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि अगर अनुभव प्रमाण पत्र में फर्जीवाड़ा हुआ है, तो क्या टेंडर सेल इन दस्तावेजों की दोबारा स्वतंत्र जांच करेगा? टेंडर प्रक्रिया को दूषित करने वाले जिम्मेदारों पर गाज गिरेगी या फिर हमेशा की तरह पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? इतनी भारी-भरकम रकम के टेंडर में स्क्रूटनी किस स्तर पर हुई और इसका असली मास्टरमाइंड कौन है, यह तय होना अभी बाकी है।

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