दो कद्दावर नेताओं की जुगलबंदी ने उजाड़ा भरनी का भूगोल: अवैध खनन से छलनी हुई सरकारी जमीन, सुशासन के दावे तार-तार

दो कद्दावर नेताओं की जुगलबंदी ने उजाड़ा भरनी का भूगोल: अवैध खनन से छलनी हुई सरकारी जमीन, सुशासन के दावे तार-तार

 बिलासपुर। न्यायधानी इर्द- गिर्द इलाकों में इन दिनों सरकारी संपत्तियों पर डकैती का खुला खेल चल रहा है। बिलासपुर के भरनी क्षेत्र में माफियाओं ने न केवल सरकारी जमीन को छलनी कर दिया है बल्कि पर्यावरण के रक्षक पेड़ों की भी बेरहमी से बलि दी जा रही है। हैरानी की बात यह है कि यह पूरा गोरखधंधा किसी सुनसान अंधेरी रात में नहीं बल्कि दिन के उजाले में प्रशासन की नाक के नीचे बेखौफ होकर चल रहा है। स्थानीय लोगों के भारी विरोध के बावजूद जिम्मेदार विभागों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है जिससे भ्रष्टाचार के सिंडिकेट की गहराई का अंदाजा लगाया जा सकता है।

भरनी और पेंडारी बने अवैध उत्खनन के हॉटस्पॉट

भरनी, पेंडारी और चोरभट्टी जैसे इलाके इन दिनों अवैध मुरूम उत्खनन की नए केंद्र बन गए हैं। यहां सरकारी जमीन का सीना चीरकर मुरूम निकालने के लिए भारी भरकम पोकलेन मशीनों का उपयोग किया जा रहा है । उत्खनन की राह में आने वाले हरे भरे पेड़ों को काटकर उनकी लकड़ियों को ट्रैक्टरों में भरकर खुलेआम ठिकाने लगाया जा रहा है। पर्यावरण को पहुंच रहे इस अपूरणीय नुकसान और सरकारी राजस्व को लग रही करोड़ों की चपत पर खनिज विभाग मौन बैठा है।

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लइस अवैध उत्खनन के काले खेल ने गांवों की प्राथमिक सुविधाओं को भी नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि गांव की सड़कों को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत हल्के वाहनों के लिए बनाया गया था, उन पर अब 12 चक्का वाले भारी हाइवा श्रेणी के वाहन दौड़ रहे हैं। तकनीकी नियमों के अनुसार इन सड़कों पर 15 टन भार की सीमा तय है लेकिन माफियाओं के वाहन 35 से 40 टन मुरूम लादकर सड़कों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। इसके कारण ग्रामीण सड़कों में बड़े-बड़े गड्ढे हो गए हैं जिससे आवाजाही न केवल मुश्किल बल्कि खतरनाक भी हो गई है।

सुशासन की सरकार पर सवाल: जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं

इस पूरे मामले में सबसे विवादित और चौंकाने वाला पहलू सत्ताधारी दल के बड़े नेताओं की कथित संलिप्तता है। चर्चा है कि जिले के दो कद्दावर भाजपा नेताओं के वरदहस्त के बिना यह खुदाई संभव नहीं है। बताया जा रहा है कि इनमें से एक नेता बिलासपुर के ही युवा और ऊर्जावान चेहरे के रूप में जाने जाते हैं जबकि दूसरे नेता जिले  के उसी क्षेत्र से आते हैं जहां ये खोदाई जारी है बताया जाता है कि उनका रसूख इतना है कि प्रशासनिक अमला उनके सामने नतमस्तक है।ऐसे में राज्य की सुशासन वाली सरकार पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जब सत्ता पक्ष के जिम्मेदार नेता ही इस तरह के अवैध कार्यों को संरक्षण देंगे तो जनता के बीच क्या संदेश जाएगा? क्या भाजपा की सुशासन की अवधारणा केवल नारों तक सीमित है? अगर रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाएं तो आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करे?

अधिकारियों की बेरुखी: मौन स्वीकृति या डर?

जब इस संवेदनशील मुद्दे पर खनिज विभाग के जिला अधिकारी  और तखतपुर क्षेत्र की खनिज अधिकारी पद्मिनी जांगड़े से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया तो उन्होंने कॉल रिसीव करना तक मुनासिब नहीं समझा। अधिकारियों की यह बेरुखी और चुप्पी इस अंदेशे को पुख्ता करती है कि या तो विभाग की इस अवैध काम में मूक सहमति है या फिर वे राजनीतिक दबाव के आगे बेबस हैं।सरकारी जमीन की यह लूट न केवल राजस्व की चोरी है बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है। प्रशासन की इस अनदेखी ने माफियाओं के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि उन्हें कानून का कोई खौफ नहीं रह गया है। अब देखना यह है कि क्या शासन इन रसूखदारों पर नकेल कसेगा या फिर सरकारी जमीन और पेड़ों की यह लूट इसी तरह बदस्तूर जारी रहेगी।

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