मरवाही में रक्षक ही बने भक्षक रेंजर के ड्राइवर के खाते में घूस के लाखों और सरकारी गाड़ी से अवैध वसूली का खुला खेल..

मरवाही में रक्षक ही बने भक्षक रेंजर के ड्राइवर के खाते में घूस के लाखों और सरकारी गाड़ी से अवैध वसूली का खुला खेल..

पेंड्रा-गोरेला-मरवाही।मरवाही वन परिक्षेत्र में इन दिनों जंगल की सुरक्षा राम भरोसे चल रही है। जिस विभाग को सरकार ने हरियाली बचाने की जिम्मेदारी सौंपी थी अब वही विभाग जंगल का सौदागर बन बैठा है। मरवाही के जंगलों में चल रहा यह खेल महज लापरवाही नहीं बल्कि वर्दी की आड़ में चल रही संगठित लूट है। यहां वन रक्षक से लेकर ऊपर की कुर्सी तक सब एक ही रंग में रंगे नजर आ रहे हैं। मामला बेहद संगीन है क्योंकि यहां सिर्फ पेड़ों की कटाई नहीं हो रही बल्कि सिस्टम को दीमक की तरह चाटा जा रहा है। 

सूत्रों और लिखित शिकायतों के मुताबिक वन रक्षक राकेश पंकज और हरिहर डहरिया उइके पर आरोप है कि उन्होंने तस्करों के साथ यारी गांठ ली है। कटरा उषाढ़ और बेलझिरिया गांव के जंगलों में साल और सागौन के कीमती पेड़ रात के अंधेरे में काटे जा रहे हैं। मजे की बात यह है कि जिस साल की लकड़ी को छूना भी कानूनन जुर्म है उसे विभाग की नाक के नीचे से काटकर मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश भेजा जा रहा है।

 

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साहब की नई कुर्सी और कमाई की पुरानी भूख..

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हैरानी की बात यह है कि मरवाही वन परिक्षेत्र अधिकारी मुकेश कुमार साहू को कुर्सी संभाले अभी जुम्मा जुम्मा दो महीने ही हुए हैं। आमतौर पर नया अधिकारी आता है तो व्यवस्था सुधारने की बात करता है लेकिन यहां तो गंगा ही उल्टी बह रही है। आरोप है कि आते ही कमाई का मीटर चालू कर दिया गया है। जनता कह रही है कि नए साहब के हौसले इतने बुलंद हैं कि कानून और नियम सब खूंटी पर टांग दिए गए हैं। ऐसा लगता है मानो पोस्टिंग सेवा के लिए नहीं बल्कि मेवा खाने के लिए ली गई हो। स्थानीय लोग दबी जुबान में कह रहे हैं कि जंगल बचाने वाले ही अब जंगल का सौदा कर रहे हैं और तस्करों को वीआईपी ट्रीटमेंट मिल रहा है।

 

सरकारी गाड़ी बनी वसूली रथ..

 

इस कहानी में सबसे मसालेदार और शर्मनाक मोड़ तब आता है जब सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल होता है। जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाले वन विभाग के शासकीय वाहन का उपयोग जंगल की गश्त के लिए होना चाहिए था लेकिन मरवाही में इसका इस्तेमाल रात में वसूली के लिए हो रहा है। बरौर से मरवाही के बीच चलने वाले कमर्शियल वाहनों को रोककर पैसे ऐंठे जा रहे हैं। जब सरकारी गाड़ी ही वसूली का अड्डा बन जाए तो फिर आम आदमी शिकायत करने किसके पास जाएगा। यह कोई निजी गुंडे नहीं बल्कि सरकारी मुलाजिम हैं जो रात के अंधेरे में अपनी वर्दी का रौब झाड़कर जेबें भर रहे हैं।

 

ड्राइवर के खाते में लाखों का डिजिटल झोल..

 

कहते हैं कि अपराधी कितना भी शातिर क्यों न हो कोई न कोई निशान छोड़ ही जाता है। यहां भी पाप का घड़ा फूटा है डिजिटल पेमेंट से। तीन स्क्रीनशॉट सामने आए हैं जो चिल्ला चिल्ला कर भ्रष्टाचार की गवाही दे रहे हैं। रेंजर मुकेश कुमार साहू के निजी ड्राइवर तेज सिंह रजक के बैंक खाते में 1 लाख 44 हजार रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर किए गए हैं। अब सवाल यह उठता है कि एक मामूली ड्राइवर के खाते में इतनी बड़ी रकम क्यों आएगी। जानकार बताते हैं कि ड्राइवर तो बस एक मोहरा है असली खिलाड़ी तो कोई और है। बिना साहब की मर्जी के ड्राइवर परिंदा भी नहीं मार सकता तो फिर लाखों का लेनदेन कैसे कर लेगा। खबर तो यह भी है कि करीब 30 हजार रुपये नकद भी लिए गए और उस वक्त खुद रेंजर साहब वहां मौजूद थे। यह साफ इशारा है कि दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है।

 

चोर की दाढ़ी में तिनका और जांच का लॉलीपॉप..

 

भ्रष्टाचार का यह खेल इतना पक्का है कि जब कुछ लोगों ने आवाज उठाने की कोशिश की तो उन्हें ही दबाया जाने लगा। बीट में अपराध साबित होने के बाद भी दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय शिकायत करने वालों को मानसिक रूप से तोड़ा जा रहा है। यह सब देखकर लगता है कि इस पूरे खेल को ऊपर से भी आशीर्वाद प्राप्त है। वन मंडलाधिकारी ग्रीष्मी चांद ने मीडिया को बताया है कि एसडीओ को जांच के आदेश दे दिए गए हैं और रिपोर्ट आने पर कार्रवाई होगी। लेकिन मरवाही की जनता अब इन सरकारी बयानों और जांच कमेटियों से थक चुकी है।

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