शिक्षा विभाग में मलाईदार पदों का मोह : बच्चों को पढ़ाने के बजाय दफ्तरों में बाबूगिरी कर रहे शिक्षक

शिक्षा विभाग में मलाईदार पदों का मोह : बच्चों को पढ़ाने के बजाय दफ्तरों में बाबूगिरी कर रहे शिक्षक

रायपुर। छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभाग में इन दिनों अजीब खेल चल रहा है। बच्चों को स्कूलों में पढ़ाने के लिए भर्ती किए गए शिक्षक क्लासरूम छोड़कर दफ्तरों में बाबूगिरी करने में जुटे हैं। आलम यह है कि राजधानी रायपुर से लेकर न्यायधानी बिलासपुर तक समग्र शिक्षा और ओपन स्कूल जैसे विभागों में तय सेटअप से कहीं ज्यादा लोगों को उपकृत करने के लिए बैठा दिया गया है। नियमों को ताक पर रखकर की गई इन नियुक्तियों के कारण सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ रहा है और स्कूलों में शिक्षकों की कमी से बच्चों का भविष्य दांव पर लगा है।

अतिरिक्त पद बनाकर अपनों को दी गई पोस्टिंग

सूत्रों के मुताबिक ओपन स्कूल में उन शिक्षकों को भी पोस्टिंग दे दी गई है जिनके समकक्ष वहां एक भी पद खाली नहीं है। कायदे से इन शिक्षकों को स्कूलों में भेजकर बच्चों को पढ़ाना चाहिए था लेकिन रसूख के चलते इन्हें मलाईदार दफ्तरों में अटैच कर दिया गया है। यही हाल समग्र शिक्षा मिशन का है जहां सहायक संचालकों के मात्र 11 पद स्वीकृत हैं लेकिन वर्तमान में यहां 15 से ज्यादा लोग इस कुर्सी पर काबिज हैं। एपीसी और अन्य पदों पर भी नियम विरुद्ध तरीके से भर्ती की जा रही है।

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बिलासपुर में भी रसूखदारों का जमावड़ा

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रायपुर की तरह बिलासपुर में भी शिक्षा विभाग का बुरा हाल है। यहाँ भी कई रसूखदार शिक्षक सालों से स्कूलों की शक्ल तक नहीं देखे हैं। जेडी ऑफिस और डीईओ दफ्तर में शिक्षकों ने जुगाड़ के दम पर अपनी जगह बना ली है। बिलासपुर संभाग के कई ग्रामीण स्कूलों में जहां शिक्षकों की भारी कमी है वहीं शहर के दफ्तरों में बाबूगिरी करने के लिए शिक्षकों की लंबी फौज खड़ी है। यहां भी सेटअप से बाहर जाकर काम करवाने की लगातार शिकायतें मिल रही हैं लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल फाइलें दौड़ रही हैं।

डीपीआई में भी नियमों की उड़ रही धज्जियां

लोक शिक्षण संचालनालय यानी डीपीआई में तो अनियमितताओं की जैसे बाढ़ आ गई है। यहां सेटअप से ज्यादा कर्मचारियों को रखकर उन्हें वेतन बांटा जा रहा है। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि यहां सहायक संचालकों की फौज खड़ी कर दी गई है। बार-बार शिकायतों के बाद भी बड़े अफसरों ने इस पर चुप्पी साध रखी है जिससे साफ है कि नीचे से ऊपर तक सबकी मिलीभगत है।

शिक्षा विभाग का बिगड़ा गणित

समग्र शिक्षा में सहायक संचालकों के स्वीकृत पद 11 हैं। इसके उलट यहां 15 से ज्यादा लोग काम कर रहे हैं। इसी तरह ओपन स्कूल में शिक्षकों के लायक पद नहीं होने के बाद भी जबरिया पोस्टिंग दी गई है। डीपीआई और बिलासपुर के विभागीय दफ्तरों में भी दर्जनों ऐसे लोग जमे हैं जिनकी वहां जरूरत ही नहीं है। इन अतिरिक्त पदों पर बैठे लोगों के कारण शासन को हर महीने लाखों रुपए की चपत लग रही है।

बच्चों का नुकसान

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा नुकसान सरकारी स्कूल के उन बच्चों का हो रहा है जिन्हें बेहतर शिक्षा की जरूरत है। अगर इन अतिरिक्त शिक्षकों को स्कूलों में भेजा जाए तो पढ़ाई का स्तर सुधर सकता है। लेकिन अधिकारियों की मेहरबानी और शिक्षकों के रसूख ने शिक्षा व्यवस्था को मजाक बना दिया है। जानकार बताते हैं कि जब तक इन बाबू बन चुके शिक्षकों को वापस मैदान में नहीं भेजा जाता तब तक विभाग का ढर्रा सुधरना मुश्किल है।

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