अट्टहास शक्तिपीठ: जहां मां सती के अधर गिरने की है मान्यता, विशाल शिला में पूजी जाती हैं मां फुल्लरा
पश्चिम बंगाल : भारत की धरती पर अनेक शक्तिपीठ हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित अट्टहास शक्तिपीठ की पहचान अपने अनूठे धार्मिक स्वरूप और प्राचीन मान्यताओं के कारण विशेष है। लाभपुर के निकट स्थित मां फुल्लरा का यह धाम उस स्थान के रूप में पूजित है, जहां धार्मिक मान्यता के अनुसार माता सती का निचला होंठ गिरा था। यहां देवी की पूजा किसी सामान्य मानवाकार प्रतिमा तक सीमित नहीं है। मंदिर में धरती से निकली विशाल लालिमा लिए शिला को देवी का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। यही विशेषता इस शक्तिपीठ को श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत विशिष्ट बनाती है।
मां के अधरों से जुड़ा है अट्टहास नाम का रहस्य

शाक्त परंपरा के अनुसार, सती के देहत्याग के बाद शिव उनके शरीर को लेकर शोक में विचरण करने लगे। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभाजित किया। मान्यता है कि उनके शरीर के विभिन्न अंग जहां गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए। अट्टहास के संबंध में विश्वास है कि यहां माता सती का अधर ओष्ठ अर्थात निचला होंठ गिरा था। देवी यहां फुल्लरा नाम से पूजित हैं, जबकि भगवान शिव के भैरव स्वरूप को विश्वेश कहा जाता है। ‘अट्टहास’ शब्द का सामान्य अर्थ जोरदार हंसी या ठहाका है। देवी के अधरों से जुड़ी मान्यता के कारण इस नाम को धार्मिक और प्रतीकात्मक अर्थो में भी देखा जाता है। इस प्रकार मंदिर का नाम ही श्रद्धालुओं को देवी की प्राचीन कथा से जोड़ देता है।
प्रतिमा नहीं, विशाल शिला में मां का दिव्य स्वरूप

अट्टहास मंदिर की सबसे विशिष्ट पहचान यहां पूजी जाने वाली विशाल शिला है। सामान्य मंदिरों में जहां देवी की प्रतिमा प्रमुख होती है, वहीं लाभपुर के फुल्लरा धाम में धरती से निकली बड़ी शिला को देवी का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक परंपरा में इस शिला को माता सती के अधर से जोड़कर देखा जाता है। यहां देवी की उपासना का स्वरूप श्रद्धालुओं को प्रकृति और शक्ति के संबंध की याद दिलाता है। शिला को केवल पत्थर नहीं, बल्कि आदिशक्ति की उपस्थिति का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। यही कारण है कि इस मंदिर का महत्व केवल स्थापत्य या मूर्ति-कला से नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही धार्मिक मान्यता से भी जुड़ा है।
108 नीले कमलों की कथा और पवित्र सरोवर
मंदिर के निकट स्थित विशाल जलाशय से जुड़ी एक रोचक लोककथा भी प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, जब श्रीराम को रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए देवी दुर्गा की आराधना करनी थी, तब हनुमानजी ने पूजा के लिए 108 नीले कमल जुटाने में सहायता की थी। इस कथा को मंदिर के पवित्र जलाशय से जोड़ा जाता है। यह प्रसंग धार्मिक लोकपरंपरा का हिस्सा है, न कि प्रमाणित ऐतिहासिक घटना। फिर भी यह अट्टहास धाम की सांस्कृतिक स्मृति को विशिष्ट बनाता है। देवी उपासना में कमल का विशेष महत्व है और 108 की संख्या हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों में पवित्र मानी जाती है।
भैरव विश्वेश के बिना अधूरी शक्तिपीठ की परंपरा
शक्तिपीठों का संबंध देवी के साथ भैरव स्वरूप से भी माना जाता है। अट्टहास में मां फुल्लरा के साथ शिव विश्वेश नाम से पूजित हैं। यह धार्मिक अवधारणा शक्ति और शिव के अभिन्न संबंध को अभिव्यक्त करती है। देवी को सृजन और ऊर्जा की अधिष्ठात्री माना जाता है, जबकि भैरव उनके क्षेत्र के रक्षक स्वरूप के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इसी कारण श्रद्धालु मां फुल्लरा के दर्शन के साथ भैरव विश्वेश की उपासना को भी महत्वपूर्ण मानते हैं।
आस्था और प्रकृति का संगम
बीरभूम की धरती अपनी सांस्कृतिक विरासत, लोकपरंपराओं और धार्मिक स्थलों के लिए जानी जाती है। इसी परिवेश में स्थित अट्टहास शक्तिपीठ श्रद्धालुओं को देवी की प्राचीन मान्यताओं से जोड़ता है। यहां विशाल शिला, पवित्र जलाशय और देवी-भैरव की संयुक्त उपासना इस धाम को विशिष्ट धार्मिक पहचान प्रदान करती है। मां फुल्लरा का यह मंदिर याद दिलाता है कि भारतीय आस्था की परंपरा केवल भव्य मंदिरों और अलंकृत प्रतिमाओं में ही नहीं, बल्कि प्रकृति के सहज स्वरूप में भी देवी की उपस्थिति अनुभव करती है। सती के अधर से जुड़ी मान्यता, 108 नीले कमलों की लोककथा और शक्ति-भैरव की उपासना ये सभी तत्व अट्टहास को बंगाल के प्रमुख धार्मिक स्थलों में एक अलग स्थान देते हैं।
