जहां देवी की मूर्ति नहीं, वहां पालने में होती है मां की पूजा, नवरात्र में उमड़ता है आस्था का सैलाब
प्रयागराज : शारदीय नवरात्र की शुरुआत के साथ ही देशभर के देवी मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ने लगी है। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के बीच प्रयागराज के अलोपीबाग स्थित अलोपी देवी मंदिर की परंपरा सबसे अलग है। यहां न देवी की कोई पारंपरिक प्रतिमा है और न ही भक्त किसी चेहरे के दर्शन करते हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित पालने को ही माता का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है। यही अनोखी परंपरा इस मंदिर को विशेष पहचान देती है और नवरात्र के दिनों में यहां आस्था का सैलाब उमड़ पड़ता है।
मूर्ति की जगह पालने की पूजा

देश के अधिकांश देवी मंदिरों में श्रद्धालु मां की प्रतिमा के दर्शन करते हैं, लेकिन अलोपी देवी मंदिर में आस्था का केंद्र एक पालना है। गर्भगृह में पवित्र कुंड के ऊपर रखा यह पालना लाल वस्त्र से ढका रहता है। भक्त यहां पहुंचकर पुष्प और चुनरी अर्पित करते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाओं के साथ माता के दरबार में माथा टेकते हैं। इस मंदिर की खासियत यही है कि यहां देवी के निराकार स्वरूप की मान्यता के साथ पालने की पूजा की जाती है। भक्तों के लिए यह पालना केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि माता की उपस्थिति और कृपा का केंद्र है।
सती के अंग के ‘अलोप’ होने की मान्यता

अलोपी देवी मंदिर का संबंध माता सती से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं से बताया जाता है। प्रचलित कथा के अनुसार, भगवान शिव जब माता सती के शरीर को लेकर विचरण कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के अंगों को अलग किया। मान्यता है कि प्रयागराज के इस स्थान पर माता सती के दाहिने हाथ का पंजा गिरा और फिर अदृश्य हो गया। इसी मान्यता के कारण देवी का नाम अलोपशंकरी पड़ा और मंदिर अलोपी देवी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। हालांकि, शक्तिपीठों की संख्या और उनके स्थानों को लेकर अलग-अलग धार्मिक परंपराएं भी प्रचलित हैं।
नवरात्र में लगता है भक्तों का तांता
नवरात्र के दौरान अलोपी देवी मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन और पूजा-अर्चना होती है। प्रयागराज सहित आसपास के जिलों और दूर-दराज के इलाकों से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में भक्तों की चहल-पहल बढ़ जाती है और पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है। यहां पूजा की परंपरा भी दूसरे देवी मंदिरों से अलग है। देवी की प्रतिमा के श्रृंगार के बजाय पालने को माता का प्रतीक मानकर आराधना की जाती है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा करते हैं और माता से सुख-समृद्धि तथा परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
रक्षा सूत्र बांधकर मांगते हैं मनोकामना
अलोपी देवी मंदिर में रक्षा सूत्र का भी विशेष महत्व माना जाता है। भक्त अपनी मनोकामना लेकर मंदिर पहुंचते हैं और कलाई पर रक्षा सूत्र बांधते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसे माता के आशीर्वाद और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना माता के दरबार में स्वीकार होती है।
देवी के नाम से बसा अलोपीबाग
मंदिर की प्रसिद्धि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके आसपास का पूरा क्षेत्र अलोपीबाग के नाम से जाना जाता है। संगम नगरी आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर धार्मिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। अलोपी देवी मंदिर की विशेषता इसकी भव्यता या विशाल प्रतिमा नहीं, बल्कि वह आस्था है जो एक पालने में माता का स्वरूप देखती है। यहां भक्तों को देवी का पारंपरिक रूप दिखाई नहीं देता, फिर भी उनके विश्वास में माता की मौजूदगी का एहसास बना रहता है। नवरात्र के अवसर पर यही अनोखी परंपरा हजारों श्रद्धालुओं को इस मंदिर तक खींच लाती है।
