मातारानी की विदाई पर सिंदूर से रंग जाते हैं चेहरे, जानिए सिंदूर खेला की इस परंपरा का रहस्य
बिलासपुर : ढाक की गूंज, शंखनाद और मां दुर्गा के जयकारों के बीच जब विजयादशमी पर विदाई की बेला आती है, तो दुर्गा पूजा पंडालों का माहौल भावनाओं से भर उठता है। कहीं आंखें नम होती हैं, तो कहीं महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर मंगलकामनाएं देती नजर आती हैं। लाल सिंदूर से रंगे चेहरे और पारंपरिक साड़ियां दुर्गा पूजा की एक ऐसी परंपरा को जीवंत कर देता है, जिसे ‘सिंदूर खेला’ के नाम से जाना जाता है। पश्चिम बंगाल में विशेष रूप से प्रचलित इस रस्म में आस्था के साथ विदाई का दर्द और फिर मिलने की उम्मीद भी जुड़ी हुई है।
बेटी बनकर मायके आती हैं मां दुर्गा
बंगाल की लोकपरंपरा में मां दुर्गा को केवल शक्ति की देवी के रूप में ही नहीं, बल्कि घर की बेटी के रूप में भी देखा जाता है। मान्यता है कि मां दुर्गा अपने बच्चों के साथ मायके आती हैं और कुछ दिन भक्तों के बीच बिताने के बाद विजयादशमी पर विदा होती हैं। यही वजह है कि उनकी विदाई को परिवार की बेटी के विदा होने जैसा भाव दिया जाता है। जिस मां की नौ दिनों तक पूजा-अर्चना की जाती है, उसे विदा करते समय भक्तों का भावुक होना स्वाभाविक है। सिंदूर खेला इसी श्रद्धा की अभिव्यक्ति है। महिलाएं मां को सिंदूर अर्पित कर उनसे परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली बनाए रखने की प्रार्थना करती हैं
महिलाएं करती हैं अखंड सौभाग्य की कामना
हिंदू परंपरा में सिंदूर को सुहाग, मंगल और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। सिंदूर खेला के दौरान विवाहित महिलाएं पहले मां दुर्गा के माथे और चरणों में सिंदूर अर्पित करती हैं। इसके बाद वे एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, मिठाई खिलाती हैं और सुखी दांपत्य जीवन की शुभकामनाएं देती हैं। इस रस्म को अखंड सौभाग्य की कामना से भी जोड़ा जाता है। हालांकि, इसका भाव केवल वैवाहिक सुख तक सीमित नहीं है। यह महिलाओं के बीच आपसी स्नेह, एकजुटता और सामूहिक आनंद का भी प्रतीक है। सिंदूर लगाकर महिलाएं एक-दूसरे के जीवन में खुशहाली और मंगल की कामना करती हैं
सिंदूर अर्पित करने के बाद शुरू होता है खेला
सिंदूर खेला की पारंपरिक रस्म में मां दुर्गा को सिंदूर चढ़ाने के बाद महिलाएं एक-दूसरे के माथे और चेहरे पर सिंदूर लगाती हैं। कई पूजा पंडालों में शंखनाद, ढाक की थाप और पारंपरिक उत्सव के बीच यह रस्म निभाई जाती है। लाल रंग से रंगे चेहरे और साड़ियां इस अवसर की खास पहचान बन जाते हैं। समय के साथ सिंदूर खेला बंगाल की दुर्गा पूजा की विशिष्ट पहचान बन गया है। इसकी तस्वीरें और दृश्य अब देश के दूसरे हिस्सों में भी लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। छत्तीसगढ़ में भी दुर्गा पूजा और विसर्जन के दौरान स्थानीय परंपराओं के अनुसार मां को विदाई दी जाती है।
अगले वर्ष फिर आने की उम्मीद
सिंदूर खेला में विदाई का दुख भी है और भविष्य में दोबारा मिलने का भरोसा भी। महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर शुभकामनाएं देती हैं और मां दुर्गा से अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करती हैं। यह परंपरा बताती है कि विदाई किसी रिश्ते का अंत नहीं, बल्कि दोबारा मिलन की प्रतीक्षा भी है। विसर्जन के लिए मां की प्रतिमा भले ही पंडाल से विदा हो जाए, लेकिन भक्तों के मन में उनकी आस्था और विश्वास बने रहते हैं। सिंदूर खेला का यही भावनात्मक संदेश है कि श्रद्धा के साथ मां को विदा किया जाए, उनके आशीर्वाद की कामना की जाए और अगले वर्ष उनके स्वागत की उम्मीद को मन में संजोकर रखा जाए। लाल सिंदूर में रंगे चेहरे इस बात की गवाही देते हैं कि मां दुर्गा के प्रति आस्था केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि प्रेम, अपनत्व और भावनाओं से भी गहराई से जुड़ी है।
