प्रेस क्लब चुनाव...विकास पैनल की बड़ी जीत, अपीलीय अधिकारी ने खारिज की आशीर्वाद पैनल की अपील नई कार्यकारणी की वैधता पर लगी मुहर...

बिलासपुर। बिलासपुर प्रेस क्लब का चुनावी विवाद अब एक नए मुकाम पर पहुंच गया है। छत्तीसगढ़ शासन के वाणिज्य एवं उद्योग विभाग मंत्रालय महानदी भवन नवा रायपुर के समक्ष प्रस्तुत पूर्व अध्यक्ष दिलीप यादव और उनकी कार्यकारिणी की अपील को खारिज कर दिया गया है। अपीलार्थियों ने फर्म्स एवं संस्थाएं पंजीयक के 18 नवंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी थी जिसमें 19 सितंबर 2025 को हुए प्रेस क्लब चुनाव को अमान्य घोषित करते हुए कलेक्टर द्वारा नामित प्रशासनिक अधिकारी को चुनाव कराने के निर्देश दिए गए थे। शासन द्वारा इस अपील के निरस्त होने से प्रेस क्लब में जारी विवाद पर लगभग विराम लग गया है। ज्ञात हो कि 19 सितंबर 2025 को हुए चुनाव में संस्था की उपविधि के अनुसार साधारण सभा की बैठक में लिए गए निर्णय के बाद महेश तिवारी को निर्वाचन अधिकारी नियुक्त किया गया था। दिलीप यादव के नेतृत्व वाली कार्यकारिणी का कहना था कि चुनाव अधिकारी ने तय कार्यक्रम के अनुसार आपत्तियों का निराकरण करते हुए सही तरीके  से मतदान करवाया जिसमें दिलीप यादव अध्यक्ष निर्वाचित घोषित हुए और नई कार्यकारिणी ने अपना कामकाज शुरू कर दिया। जिसके खिलाफ प्रेस क्लब सदस्य दिलीप अग्रवाल पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र गवई और वरिष्ठ सदस्य अजीत मिश्रा ने चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची को गलत और नियम विरुद्ध नाम जोड़े जाने की शिकायत सहायक पंजीयक बिलासपुर के समक्ष दर्ज कराई। पंजीयक फर्म्स एवं संस्थाएं नवा रायपुर ने शिकायतकर्ताओं के पत्रों का हवाला देते हुए 18 नवंबर 2025 को एकतरफा आदेश जारी किया था। इस आदेश में निर्वाचन प्रक्रिया को अमान्य करते हुए बिलासपुर कलेक्टर द्वारा नामित किसी प्रशासनिक या राजस्व अधिकारी को चुनाव अधिकारी नियुक्त कर नए सिरे से चुनाव कराने के निर्देश दिए गए। पंजीयक ने चुनाव रद्द करने के लिए अधिनियम की धारा 27 और 28 के तहत जानकारी समय पर प्रस्तुत न करने और मतदाता सूची में सदस्यों की आपत्तियों का निराकरण न होने जैसे आठ अलग अलग बिंदु पर आपत्ति की। पंजीयक के इस फैसले के खिलाफ अपीलार्थी दिलीप यादव और बिलासपुर प्रेस क्लब ने अपनी अपील में कई विधिक तर्क रखे थे। अपीलार्थियों का मुख्य आधार यह था कि पंजीयक ने आदेश पारित करने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का कोई अवसर नहीं दिया। उन्हें न तो कोई आरोप पत्र सौंपा गया और न ही जांच प्रतिवेदन की प्रतिलिपि दी गई। उनका तर्क था कि बिना सुनवाई के पीठ पीछे लिया गया यह फैसला नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत का खुला उल्लंघन है। इस आदेश से पीड़ित होकर संस्था ने सबसे पहले बिलासपुर उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय ने 15 दिसंबर 2025 को मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं को सक्षम अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपनी अपील प्रस्तुत करने का निर्देश देते हुए उनकी अपील पर सुनवाई से इनकार कर दिया। दूसरी ओर इस पूरे मामले में उत्तरवादी बनाए गए दिलीप अग्रवाल वीरेंद्र गवई और अजीत मिश्रा की ओर से भी शासन के समक्ष अपना मजबूत लिखित जवाब और प्रारंभिक आपत्तियां प्रस्तुत की गई थीं। उत्तरवादियों ने क्षेत्राधिकार और सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न न्याय दृष्टांतों का हवाला देते हुए अपील की ग्राह्यता पर ही सवाल खड़े किए थे। उनका स्पष्ट आरोप था कि चुनाव प्रक्रिया में भारी अनियमितताएं बरती गईं और सहायक पंजीयक के निर्देशों की अनदेखी करते हुए मनमाने ढंग से परिणाम घोषित किए गए। उत्तरवादियों का यह भी तर्क था कि ऐसे मामलों में निर्वाचन याचिका ही एकमात्र कानूनी उपाय है और पंजीयक का आदेश पूरी तरह से विधि सम्मत है। मामले में सुनवाई के दौरान अपीलीय अधिकारी ने अपने निर्णय में कहा कि अभिलेखों के अवलोकन से यह साफ होता है कि अपीलार्थी द्वारा संस्था की निर्वाचन प्रक्रिया प्रारंभ होने से पूर्व किसी प्रकार की आपत्ति या अपील प्रस्तुत नहीं की गई। इसके विपरीत, अपीलार्थी स्वयं उक्त निर्वाचन प्रक्रिया में सहभागी रहा है तथा उसने निर्वाचन प्रक्रिया में भाग लेकर उसके परिणाम को स्वीकार किया अपीलीय अधिकारी ने कहा कि विधि का यह स्थापित सिद्धांत है कि कोई व्यक्ति किसी प्रक्रिया में स्वेच्छा से भाग लेने के पश्चात, परिणाम प्रतिकूल होने पर उसी प्रक्रिया की वैधता को चुनौती नहीं दे सकता। न्यायालय ने इस संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने Madan Lal vs State of Jammu & Kashmir तथा Dhananjay Malik vs- State of Uttaranchal के निर्णय का हवाला दिया जिसमें स्पष्ट है कि कोई अभ्यर्थी / व्यक्ति चयन अथवा निर्वाचन प्रक्रिया में भाग लेता है और बाद में परिणाम से असंतुष्ट होकर प्रक्रिया को चुनौती देता है, तो ऐसी चुनौती ग्राह्य योग्य नहीं होती।
उक्त न्यायिक सिद्धांतों तथा प्रकरण के तथ्यों के बिनह पर यह स्पष्ट है कि अपीलार्थी, जो स्वयं निर्वाचन प्रक्रिया में सहभागी रहा है, अब उसी प्रक्रिया को चुनौती देने का अधिकारी नहीं है। जिसके आधार पर वाणिज्य एवं उद्योग विभाग ने अपील कर्ता दिलीप यादव और कार्यकारणी की अपील खारिज कर दी। और सहायक पंजीयक बिलासपुर को निर्देशित किया कि अधिनियम की धारा 27 एवं 28 के अंतर्गत संस्था से देय राशि की वसूली की कार्यवाही सुनिश्चित करें। मामले में विकास पैनल के पक्ष में अधिवक्ता हर्षवर्धन अग्रवाल और सचिन सिंघल ने पैरवी की
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।

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