रायपुर जल संसाधन विभाग में बड़ा घोटाला बिना फील्ड गए पास हुई करोड़ों की फर्जी डीपीआर

रायपुर जल संसाधन विभाग में बड़ा घोटाला बिना फील्ड गए पास हुई करोड़ों की फर्जी डीपीआर

रायपुर। जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार का एक नया और बहुत बड़ा मामला सामने आया है। करोड़ों रुपये के सर्वे और डीपीआर बनाने के नाम पर जमकर सरकारी पैसा लूटा गया है। आरोप है कि जिन प्राइवेट एजेंसियों को सर्वे और डीपीआर तैयार करने का काम दिया गया था उन्होंने फील्ड पर कदम तक नहीं रखा। उन्होंने दफ्तर के एसी कमरों में बैठकर फर्जी डेटा के आधार पर पूरी रिपोर्ट तैयार कर ली। बिना फील्ड पर गए ही लिंक लिफ्ट कैनाल और टैंक योजनाओं की करोड़ों की सर्वे रिपोर्ट विभाग को सौंप दी गई। हद तो तब हो गई जब अधिकारियों ने इस फर्जी रिपोर्ट को पास कर दिया और एजेंसियों को करोड़ों रुपये का भुगतान भी कर दिया गया।

 निशाने पर कौन और किसके संरक्षण में हुआ यह पूरा खेल

इस खबर के जरिए सीधे तौर पर जल संसाधन विभाग के आला अधिकारी इंजीनियर इन चीफ चीफ इंजीनियर स्थानीय स्तर के अफसर और डीपीआर बनाने वाली फर्जी कंसल्टेंट एजेंसियां निशाने पर हैं। यह खबर खास तौर पर उन भ्रष्ट अधिकारियों और पूरे विभागीय सिस्टम को टारगेट करके लिखी गई है जिनकी टेबल से यह फर्जी बिल पास हुए हैं। बिना बड़े अधिकारियों की मिलीभगत और संरक्षण के कार्यालय में बैठकर फर्जी रिपोर्ट बनाना और उसका करोड़ों का भुगतान ले लेना किसी भी हाल में संभव नहीं है। पूरा मैनेजमेंट इस महाघोटाले में शामिल नजर आ रहा है जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा है।

65 कार्यों की गुणवत्ता और प्रामाणिकता पर सवाल

यह पूरा मामला काम की गुणवत्ता उसकी सच्चाई और भुगतान के तरीके तीनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जल संसाधन जैसी बेहद जरूरी और किसानों की सिंचाई से जुड़ी परियोजनाओं में बिना मौके पर गए रिपोर्ट बनाना सिर्फ पैसों की बर्बादी नहीं है। यह भविष्य में बनने वाले इन प्रोजेक्ट्स के वजूद पर भी बहुत बड़ा खतरा है। बिना जमीन देखे बनाए गए नक्शे और रिपोर्ट धरातल पर कभी कामयाब नहीं हो सकते। इससे सीधा नुकसान आम जनता और किसानों को होगा जिन्हें खेती के लिए पानी की सख्त जरूरत है।

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 जीआईएस लॉग और ड्रोन डेटा की फॉरेंसिक जांच की मांग

इस फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद अब कड़े कदम उठाने की मांग की जा रही है। मांग है कि इन 65 कार्यों से जुड़े सभी जीआईएस लॉग फील्ड बुक जीपीएस ट्रैक फोटोग्राफ और साइट निरीक्षण के कागजातों की बारीकी से फॉरेंसिक जांच कराई जाए। अगर एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में ड्रोन या लिडार जैसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कागजों पर दिखाया है तो उसके असली डेटा की तकनीकी जांच बहुत जरूरी है। इससे यह साफ हो जाएगा कि कंप्यूटर पर बैठकर डेटा कॉपी पेस्ट किया गया है या असल में साइट पर कोई काम हुआ है।

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थर्ड पार्टी जांच हो और ठेकेदार हों ब्लैकलिस्ट

जानकारों का कहना है कि अब तक हुए सभी भुगतानों मेजरमेंट बुक फील्ड रिकॉर्ड और जमा की गई रिपोर्ट का थर्ड पार्टी से तकनीकी वेरिफिकेशन होना चाहिए। जिन भी प्रोजेक्ट्स में असल में साइट पर जाकर सर्वे करने के सबूत नहीं मिलते हैं वहां एजेंसियों से तुरंत पैसे की रिकवरी होनी चाहिए। अधिकारियों का बिना किसी जांच पड़ताल के ऐसी फर्जी सर्वे रिपोर्ट को आंख मूंदकर पास कर देना उनकी इस पूरे खेल में सीधी भागीदारी को साबित करता है।

 कठोर कार्रवाई का इंतजार

इस पूरे मामले में अब सख्त एक्शन का इंतजार किया जा रहा है। दोषी एजेंसियों के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज कर उन्हें तुरंत ब्लैकलिस्ट करने की मांग तेज हो गई है। साथ ही विभागीय जांच बैठाकर उन तमाम भ्रष्ट अफसरों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई की भी मांग उठ रही है जिन्होंने करोड़ों के इस फर्जीवाड़े को अंजाम तक पहुंचाया। यह देखना अहम होगा कि शासन इस गंभीर मामले में कितनी जल्दी और क्या ठोस कदम उठाता है।

 

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