13 मौतों पर सिर्फ 2 साल की सजा: बिलासपुर नसबंदी कांड में 12 साल बाद फैसला, सर्जन डॉ. गुप्ता दोषी; 5 दवा कारोबारी बरी

13 मौतों पर सिर्फ 2 साल की सजा: बिलासपुर नसबंदी कांड में 12 साल बाद फैसला, सर्जन डॉ. गुप्ता दोषी; 5 दवा कारोबारी बरी

बिलासपुर के बहुचर्चित नसबंदी कांड में 12 साल बाद कोर्ट का फैसला आ गया है। 13 मासूम महिलाओं की मौत के मामले में मुख्य आरोपी वरिष्ठ सर्जन डॉ. आरके गुप्ता को महज 2 साल की सजा सुनाई गई है। वहीं, पुलिस की कमजोर जांच और सबूतों के अभाव का फायदा उठाते हुए 5 अन्य आरोपी बरी हो गए हैं। सिस्टम की लापरवाही का आलम यह है कि 13 जान जाने के बाद भी अभियोजन पक्ष कोर्ट में अपना केस मजबूती से साबित नहीं कर पाया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शैलेष केतारप की अदालत ने सोमवार को यह अहम फैसला सुनाया। डॉ. गुप्ता को लापरवाही का दोषी माना गया है, जबकि दवा सप्लायर रमेश महावर, सुमित महावर और अन्य तीन को दोषमुक्त कर दिया गया।

3 घंटे में 83 ऑपरेशन, बिना साफ किए औजारों ने ली जान

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यह खौफनाक घटना 8 नवंबर 2014 की है। सेंदरी के नेमीचंद जैन अस्पताल में नसबंदी शिविर लगा था। रजिस्ट्रेशन 43 महिलाओं का था, लेकिन मितानिनें 83 महिलाओं को ले आईं। डॉ. आरके गुप्ता ने जल्दबाजी में केवल 3 घंटे के अंदर सभी 83 महिलाओं का ऑपरेशन कर डाला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ हुआ कि ऑपरेशन थिएटर की मशीनें और औजार स्टरलाइज (साफ) नहीं थे। इसी गंदगी से महिलाओं को सेप्टिसिमिया (इन्फेक्शन) हुआ और 13 महिलाओं की तड़प-तड़प कर मौत हो गई।

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स्वास्थ्य विभाग ने गढ़ी थी 'जहर' की झूठी थ्योरी

अपनी नाकामी छिपाने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने एक नई कहानी गढ़ी थी। दावा किया गया कि महिलाओं को दी गई 'सिप्रोसीन-500' दवा में चूहे मारने वाला जहर मिला था। इसी आधार पर महावर फार्मा और कविता फार्मा के संचालकों को जेल भेज दिया गया। लेकिन कोर्ट में यह थ्योरी बुरी तरह पिट गई। स्टेट फॉरेंसिक लैब ने जहर की पुष्टि नहीं की। जिस नेशनल इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट का हवाला दिया गया था, उसने कहा कि ऐसी कोई जांच हुई ही नहीं है। पुलिस की इस फर्जी कहानी का सीधा फायदा पांचों आरोपियों को मिला और वे बरी हो गए।

हाईकोर्ट में PIL से उठी थी न्याय की मांग

इस कांड के बाद कई मासूम बच्चों के सिर से मां का साया उठ गया था। सामाजिक कार्यकर्ता मनीशंकर पांडेय ने सबसे पहले हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) लगाकर इन बच्चों के लिए न्याय मांगा था। हाईकोर्ट के सख्त रुख के बाद ही राज्य सरकार ने सीएमएचओ डॉ. आरके भांगे और डॉ. आरके गुप्ता को बर्खास्त किया था।

हाईकोर्ट ने भी माना था- डॉक्टर पूरी तरह नाकाम रहे

डॉ. गुप्ता और डॉ. भांगे ने अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ याचिका लगाई थी, जिसे 2022 में हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने साफ कहा था कि ये दोनों अनुभवी डॉक्टर हैं। ऑपरेशन थिएटर से लेकर दवाओं तक की निगरानी इनकी जिम्मेदारी थी। ये दोनों अपना काम करने में बुरी तरह फेल रहे।

 

पीएम मोदी और राहुल गांधी ने भी लिया था संज्ञान

 मामला इतना बड़ा था कि इसकी गूंज दिल्ली तक गई थी। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह को फोन कर नाराजगी जताई थी। वहीं, कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी पीड़ित परिवारों का दर्द बांटने बिलासपुर आए थे। आज 12 साल बाद आए इस फैसले ने एक बार फिर सिस्टम की लचर कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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