हाईकोर्ट ने रेप केस में ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा, कहा- आरोपी के बचाव को अनदेखा नहीं कर सकते

हाईकोर्ट ने रेप केस में ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा, कहा- आरोपी के बचाव को अनदेखा नहीं कर सकते

बिलासपुर।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और आपराधिक धमकी के एक मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने आईपीसी की धारा 376(1) और 506 भाग II के तहत एक व्यक्ति को सुनाई गई सजा खत्म कर दी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने बचाव पक्ष द्वारा पेश किए गए जरूरी सबूतों पर ठीक से विचार नहीं किया। इन सबूतों में रेप की एफआईआर दर्ज होने से काफी पहले आरोपी द्वारा दी गई शिकायत और भेजा गया कानूनी नोटिस शामिल था।

हाईकोर्ट ने माना कि कथित झूठे आरोपों से खुद को बचाने के लिए आरोपी ने जो कानूनी कदम उठाए थे, उन्हें अभियोजन पक्ष के मामले की सच्चाई का आकलन करते समय नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जानिए क्या था पूरा मामला

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जस्टिस संजय एस. अग्रवाल ने एक आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया। इस अपील में एडिशनल सेशंस जज के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें अपीलकर्ता को रेप और आपराधिक धमकी का दोषी मानकर सजा सुनाई गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता का आरोप था कि अपीलकर्ता ने 29 सितंबर 2006 को शादी का झूठा वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद नवंबर 2006 तक कई बार यौन संबंध बनाए गए। पीड़िता का यह भी आरोप था कि उसे अपीलकर्ता के घर ले जाया गया, जहां संबंध बनते रहे। जब अपीलकर्ता ने शादी से इनकार कर दिया, तब 22 दिसंबर 2006 को एफआईआर दर्ज कराई गई।

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दूसरी तरफ, अपीलकर्ता ने इन आरोपों से पूरी तरह इनकार किया। उसने 11 नवंबर 2006 को की गई अपनी शिकायत और 15 नवंबर 2006 के कानूनी नोटिस का हवाला दिया, जो उसने पीड़िता के खिलाफ जारी किए थे। उसका तर्क था कि उसने एफआईआर दर्ज होने से काफी पहले ही झूठे आरोपों से बचने के लिए ये कदम उठाए थे।

कोर्ट की टिप्पणियां और फैसले का आधार

हाईकोर्ट ने पीड़िता के सबूतों को बारीकी से परखा। अदालत ने पाया कि पीड़िता ने खुद स्वीकार किया था कि कथित शारीरिक संबंध कई बार बने और उसने कोई विरोध नहीं किया, न ही शोर मचाया। जबकि घटना की जगह एक मुख्य रास्ते और ग्रामीणों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले तालाब के पास थी। कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि पीड़िता ने अपने माता-पिता को इस रिश्ते के बारे में कुछ नहीं बताया। इसके अलावा, मेडिकल जांच में कोई बाहरी या अंदरूनी चोट नहीं पाई गई।

अदालत ने पाया कि एफआईआर (22.12.2006) दर्ज होने से पहले ही अपीलकर्ता ने 11.11.2006 को शिकायत दर्ज कराई थी और 15.11.2006 को कानूनी नोटिस भेजा था। ये कागज बताते हैं कि अपीलकर्ता ने आरोपों से बचने के लिए कानूनी रास्ता अपनाया था। ट्रायल कोर्ट ने बचाव के इन जरूरी कागजातों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया था, जिसे कानूनी रूप से सही नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने नतीजा निकाला कि महिला का आरोप झूठा और गलत इरादे से लगाया गया था। महिला के बयान को साबित करने के लिए कोई पक्का और भरोसेमंद सबूत नहीं था। एफआईआर में देरी का भी कोई सही कारण नहीं बताया गया। सिर्फ आरोपों के आधार पर सजा को बरकरार रखना ठीक नहीं मानते हुए कोर्ट ने अपील मंजूर कर ली। सजा का फैसला रद्द करते हुए अदालत ने राजू साहू को सभी आरोपों से बरी कर दिया। (केस का शीर्षक: राजू साहू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, CRA नंबर 487/2008)

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