महाघोटालेबाज अफसर का महा-खेल : 30 करोड़ के दागी इंजीनियर आलोक अग्रवाल ने फर्जी विकलांगता प्रमाण पत्र से ली जमानत, कागजों में 71% विकलांग हैं तो आखिर कैसे कर रहे नौकरी?

महाघोटालेबाज अफसर का महा-खेल : 30 करोड़ के दागी इंजीनियर आलोक अग्रवाल ने फर्जी विकलांगता प्रमाण पत्र से ली जमानत, कागजों में 71% विकलांग हैं तो आखिर कैसे कर रहे नौकरी?

रायपुर (NJV News): छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी का एक ऐसा हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां समूचे सिस्टम की आंखों में सरेआम धूल झोंकी गई। 30 करोड़ रुपए की बेहिसाब संपत्ति के मामले में जेल की हवा खा चुके तत्कालीन प्रभारी कार्यपालन अभियंता आलोक अग्रवाल के काले कारनामों का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। इस बार जांच एजेंसियों और न्यायपालिका को चकमा देने के लिए रचे गए एक बड़े षड्यंत्र का खुलासा हुआ है। भ्रष्टाचार में गले तक डूबे इस अफसर ने कानून के शिकंजे से बचने के लिए **फर्जी विकलांगता प्रमाण पत्र (Fake Disability Certificate) का नायाब तरीका खोज निकाला।

लेकिन इस खुलासे के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जो अफसर कागजों में 71 प्रतिशत विकलांग है, वह आखिर प्रमुख अभियंता कार्यालय में बैठकर इतनी बड़ी सरकारी नौकरी कैसे कर रहा है? तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में इस दागी अफसर पर हुई इस 'विशेष मेहरबानी' ने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है।

 

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फर्जी विकलांगता प्रमाण पत्र का चौंकाने वाला खेल

 

इस पूरे प्रकरण में सबसे सनसनीखेज खुलासा आलोक अग्रवाल की 'सुविधाजनक विकलांगता' का है। आरोप है कि जब भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर मामलों में इस अफसर को जमानत नहीं मिल रही थी, तब उसने कोर्ट से सहानुभूति पाने के लिए फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट का सहारा लिया। जैसे-जैसे कानूनी शिकंजा कसता गया, कागजों पर उनकी विकलांगता का प्रतिशत' भी चमत्कारिक रूप से बढ़ता गया

 वर्ष 1991: अफसर की विकलांगता 40 प्रतिशत बताई गई।

 वर्ष 1997: विकलांगता बढ़कर 45 प्रतिशत हो गई।

 

25 फरवरी 2014: विकलांगता का ग्राफ अचानक उछला और 60 प्रतिशत पहुंच गया।

 26 अप्रैल 2018 और 1 सितंबर 2021:इन दोनों तारीखों के प्रमाण पत्रों में विकलांगता सीधे 71 प्रतिशत दर्शाई गई।

इन्हीं फर्जी 71% विकलांगता प्रमाण पत्रों का हवाला देकर आलोक अग्रवाल ने माननीय उच्च न्यायालय को गुमराह किया और ईओडब्ल्यू, एसीबी और बाद में ईडी (ED) के केस में भी जमानत हासिल कर ली।

 

71% विकलांगता: तो आखिर नौकरी कैसे कर रहे हैं आलोक अग्रवाल?

 

इस फर्जीवाड़े ने सबसे बड़ा और तार्किक सवाल खड़ा कर दिया है। मेडिकल साइंस और सरकारी नियमों के मुताबिक, 71 प्रतिशत विकलांगता एक बेहद गंभीर स्थिति होती है, जो व्यक्ति की शारीरिक और कार्य क्षमता को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।

ऐसे में सवाल उठता है कि कागजों में जो व्यक्ति 71 प्रतिशत विकलांग है, वह ईएनसी ऑफिस (बोधी) में प्रभारी अधीक्षण अभियंता जैसे महत्वपूर्ण और जिम्मेदारी वाले पद पर अपनी ड्यूटी कैसे निभा रहा है? अगर वह नौकरी करने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से 100% फिट हैं, तो कोर्ट में पेश किया गया 71% विकलांगता का प्रमाण पत्र पूरी तरह फर्जी साबित होता है। और यदि प्रमाण पत्र सही है, तो मेडिकल बोर्ड ने उन्हें इतनी अहम जिम्मेदारी संभालने के लिए 'फिटनेस' कैसे दे दी?

 

झूठ की बुनियाद पर बहाली: मैं तो कभी जेल गया ही नहीं

 

वर्ष 2021 में इस दागी इंजीनियर ने अपनी बहाली के लिए एक ऐसा आवेदन दिया, जो सफेद झूठ पर आधारित था। उन्होंने प्रमुख अभियंता को लिखित रूप में बताया कि उनकी कभी गिरफ्तारी हुई ही नहीं है और न ही वे कभी जेल गए हैं। आवेदन में सिर्फ 2014 के प्रकरण का गोलमोल उल्लेख किया गया, लेकिन 2015 के उस गंभीर प्रकरण की जानकारी छिपा ली गई, जिसके तहत वे चार साल से अधिक समय तक जेल में बंद रहे।

 

 सिस्टम की आंख पर पट्टी

आलोक अग्रवाल के इस सफेद झूठ वाले आवेदन को प्रमुख अभियंता ने बिना किसी क्रॉस-वेरिफिकेशन के सीधे शासन को भेज दिया। नतीजा यह हुआ कि करोड़ों की अवैध संपत्ति जब्त होने, ईडी की जांच चलने और चार साल जेल में रहने के बावजूद आलोक अग्रवाल की न केवल बहाली हुई, बल्कि प्रमोशन देकर उन्हें ईएनसी ऑफिस में बैठा दिया गया। 

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