रायपुर DKS में संविदा का खेल: 1 साल के लिए आए डॉक्टर 6 साल से कुर्सी पर जमे, अयोग्य को बना दिया डिप्टी सुपरिटेंडेंट, मंत्री जी मौन क्यों

रायपुर DKS में संविदा का खेल: 1 साल के लिए आए डॉक्टर 6 साल से कुर्सी पर जमे, अयोग्य को बना दिया डिप्टी सुपरिटेंडेंट, मंत्री जी मौन क्यों

रायपुर। राजधानी रायपुर के दाऊ कल्याण सिंह (डीकेएस) सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यहां संविदा (Contract) के नाम पर बैकडोर एंट्री का ऐसा पक्का जुगाड़ सेट है कि एक साल के लिए रखे गए डॉक्टर पिछले 6 साल से कुर्सी पर फेविकोल लगाकर बैठे हैं। हर साल चुपचाप इनकी मियाद रबर की तरह खींचकर बढ़ा दी जाती है।

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ताजा मामला डॉक्टरेट(PHD) हेमंत कुमार शर्मा और उनके जैसे कुछ अन्य डॉक्टरों का है। ये हर महीने करीब 1.30 लाख रुपए की मोटी सैलरी उठा रहे हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि विधानसभा के भी इस संविदा अधिकारी की मनमानी का मुद्दा गूंज चुका है। बावजूद इसके, कार्रवाई के नाम पर फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी गईं। हद तो तब हो गई जब संविदा पर आए एक अयोग्य व्यक्ति को अस्पताल का डिप्टी मेडिकल सुपरिटेंडेंट' (Deputy MS) और रजिस्ट्रार तक बना दिया गया। ऐसे में सीधा सवाल स्वास्थ्य मंत्री पर खड़ा होता है कि आखिर इन अफसरों से उनका रिश्ता क्या है?

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आइए, बारीकी से समझते हैं इस पूरे संविदा कांड की कहानी.....

2018 में ऐसे शुरू हुआ एक साल का खेल

दस्तावेज चीख-चीख कर इस मिलीभगत की गवाही दे रहे हैं। 19 सितंबर 2018 को डॉक्टरेट हेमंत कुमार शर्मा को जेएनएम मेडिकल कॉलेज से कार्यमुक्त कर डीकेएस भेजा गया। इसके ठीक 10 दिन बाद, 29 सितंबर 2018 को उन्हें डीकेएस में सह-प्राध्यापक (स्टैटिस्टिक्स एंड रिसर्च) के पद पर संविदा नौकरी दे दी गई।

नियुक्ति के आदेश में साफ-साफ लिखा था कि यह पोस्टिंग "नियमित नियुक्ति होने या एक वर्ष की अवधि, दोनों में जो पहले हो" तक के लिए है। इस पद के लिए उनका वेतन 1 लाख 20 हजार रुपए और 10 हजार रुपए सुपर स्पेशलिटी भत्ता (कुल 1.30 लाख रुपए महीना) तय किया गया। शर्त यह भी थी कि काम छोड़ने या हटाने पर एक महीने का नोटिस देना होगा। लेकिन मजे की बात देखिए, प्रबंधन ने इन्हें हटाने का कोई नोटिस आज तक निकाला ही नहीं।

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नियमित भर्ती हवा हवाई, अस्पताल में चालू है तारीख पे तारीख का खेल...

छह साल बीत गए। न तो इस पद पर कोई पक्की नियमित भर्ती हुई और न ही वह एक साल की मियाद कभी खत्म हुई। अस्पताल के बाबू हर साल सिर्फ तारीखें बदलकर आदेश निकालने में माहिर हो चुके हैं।

 अक्टूबर 2022 का जुगाड़: अस्पताल अधीक्षक ने 6 अक्टूबर 2022 को एक आदेश निकाला। इसमें डॉक्टरेट हेमंत कुमार शर्मा, डॉ. प्रफुल्ल दावले सहित 8 डॉक्टरों की संविदा एक झटके में 20 सितंबर 2023 तक बढ़ा दी गई।

  सितंबर 2024 की 'लेटेस्ट' सेटिंग: खेल यहीं नहीं रुका। डीकेएस के अधीक्षक ने 9 सितंबर 2024 को फिर से आदेश जारी कर दिया। इसमें डॉक्टरेट हेमंत शर्मा और अन्य की संविदा 22 सितंबर 2025 तक फिर बढ़ा दी गई। हर बार आदेश में वही घिसी-पिटी लाइन चिपका दी जाती है- "नियमित नियुक्ति होने या अधिकतम एक वर्ष तक।

 

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अयोग्य पर इतनी मेहरबानी क्यों? बना दिया डिप्टी सुपरिटेंडेंट

इस पूरे खेल की सबसे बड़ी और हैरान करने वाली बात यह है कि डॉक्टरेट हेमंत शर्मा अभी भी डीकेएस में डिप्टी मेडिकल सुपरिटेंडेंट और रजिस्ट्रार के पद पर जमे हुए हैं।

साल 2019 में एक सरकारी आदेश के तहत उन्हें यह अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। एक संविदा कर्मचारी, जिसकी खुद की कुर्सी का ठिकाना एक साल का होता है, उसे अस्पताल के इतने अहम प्रशासनिक पदों (रजिस्ट्रेशन, सुपरविजन आदि) पर कैसे बिठा दिया गया? यह अतिरिक्त चार्ज आज तक जारी है, जिसकी गवाही अस्पताल की आधिकारिक वेबसाइट (dkspgi.in) खुद दे रही है। कि अयोग्य व्यक्ति पर यह विशेष कृपा किसके इशारे पर हो रही है?

विधानसभा में उठा मुद्दा, फिर भी स्वास्थ्य मंत्री खामोश

सरकारी सिस्टम का अपना एक अलग ही 'इको-सिस्टम' है। एक बार संविदा के पिछले दरवाजे से अंदर घुस जाओ, फिर नियमित भर्ती का टेंशन ही खत्म। लेकिन सबसे बड़ा सवाल सूबे के स्वास्थ्य मंत्री जी पर उठता है। जब विधानसभा में जनप्रतिनिधियों ने इस अधिकारी के मामले को उठाया, तो फिर कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा क्यों पसर गया?

क्या 'जीरो टॉलरेंस' का नारा सिर्फ भाषणों के लिए है? आखिर मंत्री जी और इन चहेते अफसरों के बीच ऐसा कौन सा 'अटूट रिश्ता' है जो नियम-कानून से भी ऊपर हो गया है? लगता है सिस्टम के कायदे सिर्फ बेरोजगार युवाओं को रुलाने के लिए बने हैं। 'खास' लोगों के लिए तो बिना परीक्षा और इंटरव्यू के एक्सटेंशन वाली 'परमानेंट मलाई' हमेशा तैयार रहती है।

जगत पहल इनसाइट: दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही काली है

डीकेएस जैसे सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में 6-6 साल तक डॉक्टरों का संविदा पर चलना कोई तकनीकी चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित खेल है।

  संविदा का खुला मजाक: संविदा का मतलब इमरजेंसी और 'अस्थायी' जरूरत होता है। जब 2018 से लेकर 2024 तक किसी पद पर लगातार काम हो रहा है, तो क्या 6 साल में स्वास्थ्य विभाग एक पक्की भर्ती करने के लायक भी नहीं बचा?

 युवा डॉक्टरों के भविष्य के साथ खिलवाड़....

जो युवा और योग्य डॉक्टर सालों से पढ़ाई करके पक्की नौकरी की राह देख रहे हैं, उनके हक पर यह सीधा डाका है। जब एक ही सीट पर कोई बरसों से बैठा रहेगा, तो नई भर्तियां कहां से निकलेंगी?

 संविदा कर्मचारियों की जवाबदेही नियमित कर्मचारियों की तरह फिक्स नहीं होती। हर महीने 1.30 लाख रुपए जनता के टैक्स से लुटाने के बाद भी प्रशासन स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बनाना चाहता?

क्या जानबूझकर पक्की भर्तियां नहीं निकाली जातीं, ताकि चहेतों को संविदा का प्रसाद बांटा जा सके? अयोग्य को डिप्टी एमएस बनाना यह साबित करता है कि नियमों को ताक पर रखकर किसी खास को उपकृत किया जा रहा है।

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