सिकासेर-कोडार लिंक प्रोजेक्ट: 1700 करोड़ का काम 2500 करोड़ में, 10% कमीशन के ऑफर पर रातों-रात खुला टेंडर
रायपुर।प्रदेश में जल आपूर्ति और निर्माण की 2549 करोड़ रुपये वाली सिकासेर-कोडार लिंक योजना में बड़े खेल की बात सामने आई है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, 1700 करोड़ रुपये के वास्तविक प्रोजेक्ट का टेंडर 2500 करोड़ रुपये में निकाला गया है। आरोप है कि 'टेंडर पास करो और 10 प्रतिशत लो' के खुले ऑफर के बाद निविदा को रातों-रात खोल दिया गया। टेंडर की शर्तों में हेरफेर और चहेती कंपनी को ठेका देने के मामले में मेसर्स ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड अब सुप्रीम कोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका दायर करने जा रही है।
इस नई याचिका के माध्यम से 10 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट द्वारा दिए गए आदेश (WPC नंबर 4026/2026) को चुनौती दी जाएगी। याचिकाकर्ता का पक्ष है कि निविदा (NIT नंबर 01/SAC/2026-27) की शर्तों को किनारे रखकर एक कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाया गया और उसे L-1 घोषित कर दिया गया।
ठेकेदार ने ही बना दिया डीपीआर, L-1 और L-2 में फिक्सिंग!
सूत्रों की मानें तो इस पूरे प्रोजेक्ट का डीपीआर (DPR) भोपाल में दिलीप बिल्डकॉन द्वारा ही तैयार किया गया है। निविदा प्रक्रिया में मिलीभगत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एल-1 (L-1) और एल-2 (L-2) के बीच मात्र 30 लाख रुपये का अंतर रखा गया है।
जेवी की मनाही, फिर भी दे दी गई पात्रता
टेंडर की शर्त 3.8(a) में जॉइंट वेंचर (JV) की भागीदारी पर पूरी तरह पाबंदी है। इसके बावजूद मूल्यांकन समिति ने मध्य प्रदेश जल निगम के एक पुराने काम के आधार पर कंपनी को योग्य मान लिया। दस्तावेजों के अनुसार, एमपी जल निगम का वह प्रोजेक्ट 'DBL-SIPL (JV)' ने पूरा किया था और उसमें संबंधित कंपनी की हिस्सेदारी मात्र 65 प्रतिशत थी। अदालत में यह तर्क रखा जा रहा है कि जब जेवी मान्य ही नहीं है, तो 65 प्रतिशत की हिस्सेदारी को 100 प्रतिशत निजी अनुभव का दर्जा कैसे दे दिया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह कागजी शर्तों के पालन का विषय है, इसलिए इसकी जांच वर्तमान समिति की जगह वरिष्ठ अधिकारियों की एक स्वतंत्र समिति से कराई जानी चाहिए।
कंडिका 1.3(b) का खेल: ई-फाइल पर आपत्ति आई तो बना दी मैनुअल फाइल
पूरी टेंडर प्रक्रिया में वित्तीय शर्तों को लेकर बड़ा फेरबदल किया गया। मुख्य सचिव की 64वीं कार्यकारिणी बैठक में केवल क्लॉज 1.3(a) की मंजूरी दी गई थी, जिसमें 1,019.94 करोड़ रुपये की वित्तीय क्षमता अनिवार्य थी। आरोप है कि फाइल विभाग में आने के बाद सिद्धनाथ बर्मन, आई.ए. सिद्दीकी और मुख्य अभियंता मक्सी कुजूर ने मनमाने तरीके से नई शर्त 1.3(b) घुसा दी। इसके अनुसार 5,099.72 करोड़ रुपये का औसत सालाना टर्नओवर मांगा गया, जो प्रोजेक्ट की लागत से दोगुना है।
निविदा आमंत्रित करने के लिए जब मुख्यमंत्री से अनुमोदन लिया जाना था, तब कार्यपालन अभियंता सिंघारे ने ई-फाइल में इस बदलाव पर अपनी लिखित आपत्ति दर्ज कराई। इस पर सचिव ने मक्सी कुजूर को फटकार लगाई और सिद्दीकी को बुलाकर समझाया। इसके बावजूद सिद्दीकी और मक्सी ने सिंघारे को दरकिनार करते हुए एक नई मैनुअल (नगरी) फाइल तैयार कर ली। इसी मैनुअल फाइल को सचिव के माध्यम से मुख्यमंत्री से अनुमोदित करवाकर टेंडर निकाल दिया गया। यह 1.3(b) की कड़ी शर्त देवरगांव-मटनार और सिरपुर वाले टेंडरों में लागू नहीं की गई, इसे केवल सिकासेर-कोडार प्रोजेक्ट में रखा गया ताकि क्लॉज आपस में विरोधाभासी बन जाएं और विशेष कंपनियों का ही एकाधिकार स्थापित हो सके।
याचिका में अदालत के समक्ष रखी जाएंगी ये 4 मांगें:
- नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनी को तकनीकी रूप से अपात्र कर टेंडर से बाहर किया जाए
- दस्तावेजों और पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया की जांच के लिए एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय समिति का गठन हो।
- 30 महीने के निर्माण और 5 साल के मेंटेनेंस के लिए जेवी अनुभव को अमान्य किया जाए।
- टेंडर की वित्तीय शर्तों (1.3a और 1.3b) की व्यावहारिक व्याख्या की जाए, जिससे निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।
