रायपुर PWD का पेन कांड : ई-टेंडरिंग को ठेंगा, फाइल पर पेन चलाकर अदृश्य कंपनी को बांट दिए 50 लाख

रायपुर PWD का पेन कांड : ई-टेंडरिंग को ठेंगा, फाइल पर पेन चलाकर अदृश्य कंपनी को बांट दिए 50 लाख

रायपुर। ई-टेंडरिंग प्रणाली को सरकारी सिस्टम में इसलिए लागू किया गया था ताकि ठेकेदारों और अफसरों के नेक्सस (गठजोड़) को तोड़ा जा सके और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो। लेकिन राजधानी रायपुर के लोक निर्माण विभाग (PWD) के अफसरों ने भ्रष्टाचार का एक ऐसा 'मैनुअल मॉडल' ईजाद किया है, जिसने हाई-टेक सिस्टम की धज्जियां उड़ा दी हैं।

यहां किसी हैकर की जरूरत नहीं पड़ी, बल्कि अफसरों ने एक मामूली 'पेन' के जरिए 50 लाख रुपये का सरकारी खजाना उस कंपनी की झोली में डाल दिया, जिसने टेंडर प्रक्रिया में कभी हिस्सा ही नहीं लिया था।

क्या है पूरा मामला?

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PWD के विद्युत एवं यांत्रिकी (E/M) संभाग में 'एलईडी आरजीबी कलर स्ट्रिप लाइट्स' लगाने के लिए 50 लाख रुपये का टेंडर (टेंडर नंबर- 152168) जारी किया गया था। इस प्रक्रिया में चार फर्मों— श्रीजी इलेक्ट्रिकल्स, संतोष कुमार केसरी, श्री कृष्णा इंफ्रा डेवलपर और उज्जवल यादव ने ऑनलाइन बिडिंग में हिस्सा लिया।

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दस्तावेजों के सत्यापन के बाद केवल दो फर्में 'श्रीजी इलेक्ट्रिकल्स' और 'श्री कृष्णा इंफ्रा डवलपर' ही क्वालिफाई कर पाईं। 'श्रीजी इलेक्ट्रिकल्स' ने सबसे कम यानी एसओआर (SOR) दरों से 6.50% 'बिलो' (L-1) का रेट दिया था, जबकि दूसरी फर्म का रेट 5.50% बिलो था। नियमों के तहत कार्यादेश (वर्क ऑर्डर) L-1 यानी 'श्रीजी इलेक्ट्रिकल्स' को जारी होना था और ऐसा हुआ भी, लेकिन इसके बाद ही सिस्टम का असली खेल शुरू हुआ।

फाइल पर चला 'जादुई पेन' और बदल गया ठेकेदार

वर्क ऑर्डर जारी होने के बाद रातों-रात नोटशीट पर एक ऐसा 'पेन' चला जिसने सिस्टम के सारे नियम-कानूनों को एक झटके में काट दिया। विभाग के लिपिकों और अफसरों ने मिलीभगत कर नोटशीट पर 'श्री जी इलेक्ट्रिकल्स' का नाम पेन से काट दिया और उसके आगे मैन्युअल तरीके से फॉर्च्यून अंश  लिख दिया।

हैरानी की बात यह है कि 'फॉर्च्यून अंश' वह फर्म है जिसका इस पूरे ई-टेंडरिंग प्रक्रिया से कोई लेना-देना ही नहीं था। इस फर्म ने ऑनलाइन बिडिंग में हिस्सा तक नहीं लिया था, लेकिन फाइल पर हुए इस 'पेन-कांड' ने उसे 50 लाख के टेंडर का सीधा विजेता बना दिया।

भुगतान की ऐसी जल्दी कि आंख मूंद लिए अफसर

यह मामला सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं रहा। तत्कालीन कार्यपालन अभियंता (EE) ने बिना किसी क्रॉस-चेकिंग या ई-पोर्टल के दस्तावेजों का मिलान किए, 'फॉर्च्यून अंश' के नाम पर न केवल कार्यादेश जारी कर दिया, बल्कि नियम विरुद्ध तरीके से अनुबंध (क्रमांक 369) भी साइन कर लिया।

सिस्टम की मेहरबानी देखिए कि बिना टेंडर भरे ठेका पाने वाली इस 'अदृश्य' फर्म को 50 लाख रुपये का पूरा भुगतान भी धड़ल्ले से कर दिया गया। इस पूरे खेल में तत्कालीन अधीक्षण अभियंता (SE) की भूमिका भी गहरे सवालों के घेरे में है, जिनकी नाक के नीचे इतना बड़ा फर्जीवाड़ा बिना किसी रोक-टोक के पास हो गया।

फर्जीवाड़े को 'लीगल' दिखाने बुनी गई कहानी

इस कारनामे को कवर करने के लिए नोटशीट में एक और खेल खेला गया। अफसरों ने टेंडर नोटशीट में बाकायदा यह उल्लेख किया कि 'श्री जी इलेक्ट्रिकल्स' को उसके उद्यम रजिस्ट्रेशन (MSME) के कारण PWD और इलेक्ट्रिकल लाइसेंस में छूट दी गई है। जबकि हकीकत यह है कि फर्म की तरफ से पोर्टल पर ऐसा कोई भी दस्तावेज अपलोड ही नहीं किया गया था। यह सब सिर्फ कागजों का पेट भरने और फर्जीवाड़े को सही ठहराने के लिए किया गया।

जिम्मेदार साहब बोले- 'मुझे जानकारी नहीं'

जब इतने बड़े घोटाले पर मौजूदा अफसरों से जवाब मांगा गया, तो उनका रटा-रटाया सरकारी जवाब सामने आया। वर्तमान एसई (PWD विद्युत एवं यांत्रिकी), सुरेश धुप्पड़ ने मामले से पल्ला झाड़ते हुए कहा, *"यह मामला मेरी जानकारी में नहीं है। किस फर्म के नाम आदेश जारी हुआ और किसे काम देकर भुगतान किया गया, इस संबंध में पूरा मामला कागज देखकर ही बता पाऊंगा।"

यह मामला सिर्फ एक टेंडर का नहीं है, बल्कि यह बताता है कि अगर सिस्टम में बैठे लोग चाह लें, तो वे डिजिटल इंडिया के दौर में भी 'पेन की एक स्याही' से करोड़ों का हेरफेर कर सकते हैं। 

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