बिजली विभाग में करोड़ों की पावरफुल सेटिंग 112 टेंडरों में धांधली पर जांच का करंट सिर्फ 12 पर सिंडिकेट ने ऐसे डकारे विभाग के पैसे

बिजली विभाग में करोड़ों की पावरफुल सेटिंग 112 टेंडरों में धांधली पर जांच का करंट सिर्फ 12 पर सिंडिकेट ने ऐसे डकारे विभाग के पैसे

रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी के गलियारों में इन दिनों भ्रष्टाचार की ऐसी चिंगारी सुलगी है जिसने विभाग की साख को झुलसा कर रख दिया है। नगर वृत्त एक कार्यालय में हुए निर्माण कार्यों और सामग्री आपूर्ति के टेंडरों में भारी बंदरबांट का खुलासा हुआ है। प्राप्त जानकारी के अनुसार कुल 112 निविदाओं में गड़बड़ी की गंभीर शिकायतें दर्ज थीं लेकिन विभाग के रसूखदार तंत्र ने बड़ी चालाकी से केवल 12 टेंडर ही जांच के दायरे में रखे हैं। यह अधूरा सच विभाग को होने वाले करोड़ों के आर्थिक नुकसान की ओर इशारा कर रहा है। विभागीय सूत्रों की मानें तो यदि निष्पक्षता से सभी 112 फाइलों की परतें उधेड़ी गईं तो घोटाले का यह आंकड़ा विभाग की कल्पना से कहीं अधिक बड़ा निकल सकता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि करीब आठ माह पहले इस मामले में दोषी अफसरों को आरोप पत्र भी थमाए जा चुके हैं परंतु कार्रवाई के नाम पर अब तक केवल फाइलों को धूल फांकने के लिए छोड़ दिया गया है।

अफसरों और चार चहेते ठेकेदारों की जुगलबंदी ने विभाग में लूट की नई इबारत लिख दी है। जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया है कि निविदा की औपचारिक प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही सिंडिकेट सक्रिय हो जाता था। अधिकारी और ठेकेदार बंद कमरों में बैठकर यह तय करते थे कि कौन सा काम किस महीने में किसके खाते में जाएगा। प्रतिस्पर्धा को खत्म करने के लिए बिड की दरें भी पहले ही निर्धारित कर ली जाती थीं ताकि कागजी कार्यवाही में कोई बाधा न आए। इस मिलीभगत का सबसे शर्मनाक उदाहरण बिना टेंडर के ट्रांसफार्मर लगाने के मामले में देखने को मिला है। नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए जिस काम की वास्तविक लागत 10 लाख रुपए होनी चाहिए थी उसे अफसरों ने उदारता दिखाते हुए 12 लाख रुपए में करवाया। इस तरह के अनेक कार्यों के जरिए सरकारी खजाने को सीधा चूना लगाया गया है।

निविदा प्रक्रिया में मची इस खुली लूट की पोल खुलने के बाद प्रशासन ने बचाव की मुद्रा अपनाते हुए पांच टेंडरों को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। ये वे कार्य थे जिन्हें ठेकेदारों ने निविदा जारी होने से पहले ही पूरा कर लिया था। अब इन कार्यों के भुगतान पर रोक लगा दी गई है जिससे विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। हालांकि यह कार्रवाई ऊंट के मुंह में जीरा जैसी ही नजर आती है क्योंकि मुख्य आरोपी अभी भी अपनी कुर्सियों पर सलामत हैं। रसूख का आलम यह है कि सात महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी विभागीय जांच कछुआ गति से चल रही है। जांच की सुस्ती यह बताने के लिए काफी है कि पर्दे के पीछे से बड़े खिलाड़ी इस पूरे मामले पर लीपापोती करने की कोशिश में जुटे हैं।

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इस पूरे प्रकरण पर कंपनी के मानव संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता राजेंद्र प्रसाद का कहना है कि मामला संज्ञान में है और प्राप्त जवाबों के आधार पर विभागीय जांच की प्रक्रिया नियमानुसार आगे बढ़ाई जा रही है। भले ही प्रशासन कार्रवाई का दावा कर रहा है लेकिन जनता और ईमानदार कर्मचारियों के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि आखिर भ्रष्टाचार के इन सौदागरों पर शिकंजा कसने में इतनी देरी क्यों हो रही है। क्या कंपनी प्रबंधन केवल छोटी मछलियों पर गाज गिराकर बड़े मगरमच्छों को अभय दान देने की तैयारी में है या फिर सच में कोई कड़ा फैसला लिया जाएगा। विभाग की यह उदासीनता न केवल सरकार की छवि खराब कर रही है बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर भी सवालिया निशान लगा रही है।

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