आरटीआई में पुलिस मुख्यालय का 'डबल गेम': निलंबित IPS रतनलाल डांगी को बचाने गढ़े जा रहे नियम, सामने आया बड़ा विरोधाभास

आरटीआई में पुलिस मुख्यालय का 'डबल गेम': निलंबित IPS रतनलाल डांगी को बचाने गढ़े जा रहे नियम, सामने आया बड़ा विरोधाभास

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रायपुर।  छत्तीसगढ़ में सूचना का अधिकार (RTI) कानून अब पुलिस महकमे के लिए अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करने का 'टूल' बन गया है। पुलिस मुख्यालय (PHQ) में जानकारी देने को लेकर एक बड़ा खेल उजागर हुआ है। एक ओर जहां आम मामलों में बिना सहमति के सारी गोपनीय जानकारियां बांट दी जाती हैं, वहीं जब बात निलंबित आईपीएस अधिकारी रतनलाल डांगी की आई, तो पुलिस मुख्यालय ने थर्ड पार्टी (तीसरे पक्ष) की ऐसी ढाल बनाई है, जिसने पूरी व्यवस्था पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस विभाग के इस दोहरे मापदंड ने शासन के दावों और पारदर्शिता की पोल खोलकर रख दी है।

 

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क्या है पूरा मामला और क्या मांगी गई थी जानकारी?

बिलासपुर निवासी अधिवक्ता अभिषेक पांडेय ने 25 मार्च 2026 को एक आरटीआई आवेदन प्रस्तुत किया था। उन्होंने तत्कालीन आईजी रतनलाल डांगी द्वारा अक्टूबर 2025 में डीजीपी को भेजे गए एक शिकायत पत्र की सत्यापित प्रतियां मांगी थीं। साथ ही, उस आवेदन की कॉपी भी मांगी गई थी जिसके जरिए बाद में इस हाई-प्रोफाइल शिकायत को वापस ले लिया गया था। चूंकि यह मामला सीधे तौर पर एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी से जुड़ा था, इसलिए पुलिस मुख्यालय के अपराध अनुसंधान विभाग (CID), नवा रायपुर ने जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया।

जानकारी छिपाने के लिए 'धारा 11(1)' की आड़

जनसूचना अधिकारी ने इस मामले में आरटीआई अधिनियम की धारा 11(1) का सहारा लिया है। तर्क दिया गया कि मांगी गई जानकारी तीसरे पक्ष यानी रतनलाल डांगी से संबंधित है। नियम का हवाला देते हुए बताया गया कि संबंधित अधिकारी डांगी से इस बारे में सहमति मांगी गई थी, लेकिन उन्होंने अपनी जानकारी साझा करने से साफ 'असहमति' जता दी। इसी असहमति का पर्दा डालकर विभाग ने अपने हाथ खड़े कर लिए और जानकारी देने से मना कर दिया।

मुख्यालय का झूठ: जब रिकॉर्ड ही नहीं, तो हवा में कैसे हुई जांच?

इस पूरे खेल में सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाला पहलू यह है कि पुलिस मुख्यालय खुद अपने ही बुने जाल में बुरी तरह फंस गया है। वर्तमान जवाब से ठीक पहले, 19 मार्च 2026 को लगाए गए एक अन्य आवेदन के जवाब में इसी विभाग ने लिखित में कहा था कि संबंधित शिकायत का कोई भी रिकॉर्ड या अभिलेख उनके पास उपलब्ध ही नहीं है।

लेकिन हैरानी की बात यह है कि उसी जवाब में विभाग ने यह भी कबूल किया था कि इस मामले की जांच 'दो सदस्यीय टीम' द्वारा की गई थी। अब पुलिस की कार्यप्रणाली पर यह सवाल उठना लाजमी है कि जब मुख्यालय के पास कोई रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं था, तो दो सदस्यीय टीम ने क्या 'हवा' में जांच कर ली? और यदि सच में कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है, तो फिर अब तीसरे पक्ष (रतनलाल डांगी) से सहमति मांगने का यह नया नाटक क्यों और कैसे किया जा रहा है? यह स्पष्ट विरोधाभास सीधा इशारा करता है कि निलंबित आईपीएस को बचाने या किसी बड़ी विभागीय गड़बड़ी पर पर्दा डालने के लिए तथ्यों को घुमाया जा रहा है।

कल्पना वर्मा केस से खुली दोहरे रवैये की पोल

पुलिस विभाग के इस दोहरे रवैये की कलई 'कल्पना वर्मा' से जुड़े एक अन्य मामले से पूरी तरह खुल जाती है। उस प्रकरण में पुलिस ने बिना किसी तीसरे पक्ष की सहमति के, एक फर्जी शिकायतकर्ता को आरटीआई के तहत पूरी जानकारी सौंप दी थी। वहां थर्ड पार्टी का कोई नियम आड़े नहीं आया। एक ही विभाग, एक ही कानून, लेकिन जब बात एक निलंबित आईपीएस की आई, तो सारे नियम-कायदे याद आ गए।

 

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