नियम विरुद्ध नियुक्ति: यौन शोषण के आरोपी IPS डांगी को विभाग ने दी थी नारकोटिक्स की कमान, दागी अफसर से कराई गई थी जांच
रायपुर। छत्तीसगढ़ पुलिस महकमे में नियमों को ताक पर रखने का एक बड़ा और हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यौन शोषण के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे और वर्तमान में निलंबित IPS अफसर रतनलाल डांगी को पूर्व में रायपुर की संवेदनशील नारकोटिक्स यूनिट का प्रभार दे दिया गया था। सबसे बड़ी बात यह है कि यह आदेश सीधे विभाग ने जारी किया था, जबकि उसके पास किसी IPS अधिकारी की पोस्टिंग करने का अधिकार ही नहीं है। इस नियम विरुद्ध पदस्थापना ने पुलिस मुख्यालय से लेकर शासन तक कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विभाग ने कैसे किया शासन के अधिकारों का इस्तेमाल?
यह नियुक्ति पूरी तरह से नियमों के खिलाफ थी। भारत सरकार के नियमों और पुलिस मैनुअल के अनुसार, IPS (All India Service) अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग का अंतिम अधिकार सिर्फ राज्य सरकार के पास होता है। SP, DIG, IG या ADG स्तर के किसी भी अधिकारी की पोस्टिंग का आदेश छत्तीसगढ़ सरकार का गृह विभाग (Home Department) या सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ही जारी कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के 'प्रकाश सिंह जजमेंट' के बाद भी IPS की पोस्टिंग राज्य सरकार के ही अंतिम नियंत्रण में है। विभाग केवल निचले स्तर के पुलिसकर्मियों (जैसे DSP या उससे नीचे के राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी) की पोस्टिंग कर सकता है। IPS की पोस्टिंग के मामले में विभाग केवल 'पुलिस एस्टेब्लिशमेंट बोर्ड' के जरिए अपनी सिफारिश सरकार को भेज सकता है। इसके बावजूद, विभाग ने शासन के अधिकारों को दरकिनार करते हुए डांगी को 'आगामी आदेश तक' नारकोटिक्स का प्रभार सौंप दिया था। यह शासन के सीधे अधिकारों का उल्लंघन था।
एक दागी कर रहा था दूसरे दागी की जांच
इस मामले में केवल पोस्टिंग ही नियम विरुद्ध नहीं थी, बल्कि जांच प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। यौन शोषण के आरोपी IPS डांगी की जांच का जिम्मा जिस अधिकारी को सौंपा गया था, वह खुद दागदार है। जांच अधिकारी के तौर पर IPS आनंद छाबड़ा को नियुक्त किया गया था, जो खुद करोड़ों रुपये के महादेव सट्टा ऐप घोटाले में आरोपी हैं। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि एक आरोपी अफसर, दूसरे आरोपी अफसर की निष्पक्ष जांच कैसे कर सकता था?
रिपोर्ट दबाने और पीड़िता पर दबाव बनाने के आरोप
जानकारी के अनुसार, जांच अधिकारी आनंद छाबड़ा ने एक गोलमोल जांच रिपोर्ट तैयार कर विभाग को सौंप दी थी। लेकिन विभाग इस रिपोर्ट को दबाकर बैठा रहा। इसे शासन को आगे नहीं बढ़ाया गया था। अगर रिपोर्ट भेज भी दी गई थी, तो सरकार आरोपी अफसर के खिलाफ कार्रवाई से क्यों बच रही थी? मामले को रफा-दफा करने के लिए पीड़िता पर भी भारी दबाव बनाने की बात सामने आई है। पीड़िता की पहली शिकायत को बदलवाकर उससे दूसरा आवेदन लिया गया था, ताकि केस को कमजोर किया जा सके।
नारकोटिक्स यूनिट की कमान ही क्यों?
नारकोटिक्स यूनिट की कमान सौंपे जाने पर भी गंभीर सवाल हैं। बाहर से देखने पर यह यूनिट भले ही शांत और 'लो-प्रोफाइल' नजर आती हो, लेकिन असल में इसके पास असीमित अधिकार होते हैं। बड़े ड्रग नेटवर्क को पकड़ना, जांच करना, और छापेमारी करना इसी यूनिट का काम है। ऐसे में यौन शोषण के गंभीर आरोपों से घिरे एक अधिकारी को इतनी संवेदनशील और पावरफुल जगह पर बैठाना कई संदेह पैदा करता है।
सुशासन के दावों पर उठे सवाल
बिना अधिकार के विभाग द्वारा यह आदेश निकालना, एक दागी से जांच कराना और मामले को दबाने की कोशिश करना विष्णुदेव साय सरकार के 'सुशासन' और 'मोदी की गारंटी' को कटघरे में खड़ा कर रहा है। नियम विरुद्ध आदेश निकालकर एक आरोपी को उपकृत करने का यह मामला साफ बताता है कि सिस्टम में कुछ ठीक नहीं है। अब देखना यह है कि राज्य सरकार इस पूरे प्रकरण में और क्या कड़ी कार्रवाई करती है।
