अंबिकापुर के संजीवनी अस्पताल पर आदिवासी जमीन हड़पने और सरकारी नजूल भूमि पर कब्जे का बड़ा आरोप पीएमओ तक पहुंची शिकायत

अंबिकापुर के संजीवनी अस्पताल पर आदिवासी जमीन हड़पने और सरकारी नजूल भूमि पर कब्जे का बड़ा आरोप पीएमओ तक पहुंची शिकायत

अंबिकापुर। सरगुजा जिले के अंबिकापुर में संचालित मशहूर संजीवनी मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल अब बड़े कानूनी विवादों में घिर गया है। अस्पताल प्रबंधन पर आदिवासी समाज की सुरक्षित जमीन का व्यावसायिक इस्तेमाल करने और बेशकीमती सरकारी नजूल भूमि पर अवैध कब्जा करने का गंभीर आरोप लगा है। इस मामले की गूंज अब दिल्ली तक पहुंच गई है क्योंकि इंदौर के एडवोकेट अभिषेक मालवीय ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस पूरे खेल की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। आरोप है कि स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से अस्पताल की इमारत सरकारी और आदिवासी जमीन पर खड़ी कर दी गई है और अब तक बेदखली की कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

नजूल की बेशकीमती जमीन पर अस्पताल का कब्जा कलेक्टर ने निरस्त किया था आवंटन

मामले की शुरुआत में डॉक्टर अजय तिर्की ने ग्राम नमनाकला स्थित नजूल प्लॉट नंबर 613 की करीब 994.2 वर्ग मीटर सरकारी जमीन को अपने नाम आवंटित कराने का आवेदन दिया। शुरुआत में इस पर विचार हुआ लेकिन जुलाई 2024 में राज्य सरकार ने जमीन आवंटन के पुराने नियमों को रद्द कर दिया। इसके बाद सरगुजा कलेक्टर ने 2 सितंबर 2024 को सख्त आदेश जारी करते हुए डॉक्टर तिर्की के जमीन आवंटन आवेदन को खारिज कर दिया। कलेक्टर ने अपने आदेश में साफ कहा कि यह जमीन शहर के बीचोबीच बहुत कीमती है और भविष्य में सरकारी काम के लिए जरूरी हो सकती है। आदेश में नजूल अधिकारी को निर्देश दिए गए थे कि अस्पताल प्रबंधन द्वारा किए गए अवैध कब्जे को तुरंत हटाया जाए और बेदखली की कार्यवाही की जाए। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि कलेक्टर के आदेश के महीनों बाद भी प्रशासन ने वहां से ईंट तक नहीं हटाई है।
आदिवासी जमीन को बनाया ढाल और नॉन आदिवासी पार्टनर्स ने उठाए करोड़ों के लोन
शिकायत में सबसे सनसनीखेज खुलासा आदिवासी जमीन के दुरुपयोग को लेकर हुआ है। एडवोकेट अभिषेक मालवीय ने बताया कि अस्पताल का निर्माण जिस जमीन पर हुआ है वह आदिवासी समुदाय के डॉक्टर अजय तिर्की की है। छत्तीसगढ़ भूमि राजस्व संहिता और पेसा कानून के मुताबिक आदिवासी जमीन को किसी भी गैर आदिवासी व्यावसायिक काम के लिए न तो बेचा जा सकता है और न ही बिना अनुमति के इस्तेमाल किया जा सकता है। आरोप है कि अस्पताल के अन्य पार्टनर डॉक्टर अजय गुप्ता और डॉक्टर विकास अग्रवाल ने आदिवासी पार्टनर की जमीन को बैंक में गिरवी रखकर करोड़ों का लोन ले लिया है। यह सीधे तौर पर आदिवासी हितों का शोषण और बेनामी लेनदेन का मामला नजर आता है क्योंकि लोन की रकम का फायदा गैर आदिवासी पार्टनर उठा रहे हैं जबकि जोखिम में एक आदिवासी की पुश्तैनी जमीन लगी है।
पिछली सरकार के रसूख का मिला फायदा अब केंद्रीय एजेंसियों से जांच की मांग
प्रधानमंत्री को भेजे गए शिकायती पत्र में यह भी कहा गया है कि संजीवनी अस्पताल के संचालकों को पिछली सरकार के मंत्रियों और बड़े नेताओं का खुला संरक्षण प्राप्त था। इसी रसूख के दम पर नजूल की सरकारी जमीन पर बाउंड्री वॉल और बिल्डिंग खड़ी कर ली गई। जब राजस्व अधिकारियों ने जांच की तो पाया कि बिना किसी डायवर्सन या नक्शा पास कराए ही निर्माण कार्य किया गया है। अब मांग की गई है कि इस पूरे मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई या किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए क्योंकि स्थानीय प्रशासन दबाव में काम कर रहा है।
प्रशासनिक सुस्ती पर उठे सवाल आखिर क्यों नहीं चला अब तक बुलडोजर
इस पूरे मामले में सरगुजा प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। जब अपर कलेक्टर और कलेक्टर खुद अपनी जांच रिपोर्ट में यह मान चुके हैं कि अस्पताल ने सरकारी जमीन पर कब्जा किया है तो फिर अब तक उस कब्जे को क्यों नहीं ढाया गया। जानकारों का कहना है कि शहर के बीचोंबीच करीब 1 एकड़ से ज्यादा की इस जमीन की कीमत करोड़ों में है। एडवोकेट मालवीय ने पीएमओ से गुहार लगाई है कि अस्पताल की बिल्डिंग को तुरंत सील किया जाए और आदिवासी जमीन को वापस मूल स्वरूप में लाया जाए। साथ ही उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो जिन्होंने इस अवैध निर्माण को अपनी आंखों के सामने फलते फूलते देखा।

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डिस्क्लेमर: यह समाचार प्राप्त दस्तावेजों और शिकायतकर्ता द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे गए पत्र में लगाए गए आरोपों पर आधारित है। इन आरोपों की सत्यता की जांच अभी सरकारी स्तर पर जारी है और संबंधित पक्ष को अपनी बात रखने का पूरा कानूनी अधिकार है।

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