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महिला बाल विकास में 16 करोड़ का खेल: टेंडर से बचने 155 टुकड़ों में बांटा काम, मूली-गाजर की तरह खरीद रहे टीवी-आरओ
रायपुर। प्रदेश के महिला एवं बाल विकास विभाग में भ्रष्टाचार का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां 'सक्षम आंगनबाड़ी योजना' के तहत आए 16.61 करोड़ रुपए ठिकाने लगाने की बड़ी तैयारी चल रही है। टेंडर की पारदर्शी प्रक्रिया से बचने के लिए अफसरों ने इस बड़े बजट को 155 छोटे टुकड़ों में बांट दिया है। अब आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए टीवी और वाटर प्यूरीफायर (आरओ) बाजार में मूली-गाजर की तरह खरीदे जा रहे हैं। न कोई क्वालिटी चेक है और न ही ब्रांड की कोई शर्त। ठेकेदार जो कबाड़ थमा दे, विभाग आंख मूंदकर उसी का भुगतान करने को तैयार है।
ऐसे रची गई बंदरबांट की साजिश
नियम कहता है कि इतनी बड़ी खरीदी के लिए एक केंद्रीय टेंडर होना चाहिए। इसमें टीवी और आरओ की तकनीकी शर्तें (जैसे- कितने इंच की टीवी, कौन सी कंपनी, कितनी वारंटी) तय की जाती हैं। टेंडर होने से बड़ी कंपनियां हिस्सा लेती हैं और सामान क्वालिटी वाला मिलता है। लेकिन विभाग ने खेल कर दिया। एकमुश्त टेंडर निकालने के बजाय पूरा बजट ब्लॉक स्तर पर भेज दिया गया।
हर ब्लॉक को टीवी के लिए 5 लाख और आरओ के लिए 2 लाख रुपए दिए गए। ऐसा इसलिए किया गया ताकि खरीदी का बजट 10 लाख से कम रहे। 10 लाख से कम होने पर टेंडर की जरूरत नहीं पड़ती। सिर्फ 3 कोटेशन मंगाकर चहेते ठेकेदार को काम दिया जा सकता है। अब ब्लॉक स्तर पर 25 हजार की टीवी और 10 हजार के आरओ का ऑर्डर दिया जा रहा है। ठेकेदार चाइनीज माल दे या लोकल, कोई देखने वाला नहीं है। गरियाबंद के देवभोग और मैनपुर में तो इसी तर्ज पर खरीदी पूरी भी हो चुकी है।
3 दिन में करोड़ों खपाने का टारगेट
इस योजना में 60 फीसदी पैसा केंद्र सरकार का और 40 फीसदी राज्य का है। पिछले दो साल (2023-24 और 2024-25) से यह पैसा रखा हुआ था। पूरे साल अफसरों ने टेंडर नहीं निकाला। अब जब वित्तीय वर्ष खत्म होने को है, तो 19 मार्च की रात को सभी ब्लॉक अधिकारियों को अचानक खरीदी का आदेश थमा दिया गया।
25 मार्च के बाद ट्रेजरी में बिल नहीं लगेंगे। बीच में तीन दिन की छुट्टी भी है। इसका मतलब है कि सिर्फ 3 दिन के अंदर सामान का ऑर्डर देना है, सप्लाई लेनी है, भौतिक सत्यापन (वेरिफिकेशन) करना है और पेमेंट भी कर देना है। इतनी हड़बड़ी साफ बता रही है कि नीयत में बड़ा खोट है।
पेंटिंग और हार्वेस्टिंग के नाम पर भी लूट
सिर्फ टीवी-आरओ ही नहीं, प्रदेश के 2234 आंगनबाड़ी केंद्रों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग और वाल पेंटिंग के नाम पर भी बड़ा खेल चल रहा है। हर केंद्र में पेंटिंग के लिए 10 हजार और हार्वेस्टिंग के लिए 16 हजार रुपए तय किए गए हैं। कुल मिलाकर हार्वेस्टिंग के लिए 3.57 करोड़ और पेंटिंग के लिए 2.89 करोड़ खर्च होंगे। मजेदार बात यह है कि यहां भी कोई तकनीकी शर्त नहीं रखी गई है कि हार्वेस्टिंग सिस्टम कैसा होगा, उसमें क्या मटेरियल लगेगा या उसकी गहराई कितनी होगी।
अफसरों की अपनी दलील
इस पूरे मामले पर महिला एवं बाल विकास विभाग की संचालक रेणुका श्रीवास्तव की अपनी अलग दलील है। उनका कहना है कि केंद्र से 18 मार्च को राशि आई, इसलिए हमने तुरंत ब्लॉक में पैसा भेज दिया। जेम (GeM) पोर्टल में टेंडर लाइव है, मापदंड डाले गए हैं और जिसका रेट सबसे कम (L-1) होगा, उसी से खरीदी होगी।
हालांकि, यह दलील गले नहीं उतरती। जब ब्लॉक स्तर पर ब्रांड और तकनीकी मापदंड (Specification) ही साफ नहीं हैं, तो पारदर्शी खरीदी कैसे हो सकती है? बिना शर्तों के जेम पोर्टल से भी ठेकेदार रद्दी माल ही सप्लाई करेंगे।
लेखक के विषय में
मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
