छत्तीसगढ़ में लालबत्ती का इंतजार सत्ता के बचे मात्र ढाई साल, 300 पदों पर अटकी नियुक्तियों से दावेदारों में बेचैनी
रायपुर। छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही राजनीतिक पुनर्वास की राह देख रहे दिग्गज नेताओं और कार्यकर्ताओं का धैर्य अब जवाब देने लगा है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार का लगभग आधा कार्यकाल बीतने को है लेकिन निगम मंडल, आयोग और प्राधिकरणों में बंपर नियुक्तियों का इंतजार खत्म नहीं हुआ है। मौजूदा स्थिति यह है कि 300 से अधिक राजनीतिक पद आज भी खाली पड़े हैं। सरकार के पास अब सक्रिय रूप से काम करने के लिए महज ढाई साल का समय शेष है। राजनीतिक गलियारों में अब यह सुगबुगाहट तेज हो गई है कि यदि जल्द ही इन पदों पर नेताओं को नहीं बिठाया गया तो आगामी विधानसभा चुनाव में इस लेटलतीफी का सीधा नुकसान संगठन को उठाना पड़ सकता है।
सोशल इंजीनियरिंग के फेर में फंसा पेंच
सरकार और संगठन के सामने सबसे बड़ी चुनौती सभी वर्गों को साधने की है। यही वजह है कि छग केश शिल्पी बोर्ड और राज्य उर्दू अकादमी के साथ ही दीनदयाल शोधपीठ, कबीर शोधपीठ, स्वामी विवेकानंद शोधपीठ और पंडित सुंदरलाल शर्मा शोधपीठ जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर अध्यक्षों की नियुक्ति रुकी हुई है। पार्टी आलाकमान इन पदों के जरिए पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक समुदाय को एक साथ साधना चाहता है जिसके कारण नामों पर अंतिम मुहर लगने में देरी हो रही है।
उपाध्यक्ष और सदस्य पदों के लिए मची होड़
सबसे ज्यादा मारामारी उपाध्यक्ष और सदस्य के पदों को लेकर देखी जा रही है। श्रम कल्याण मंडल, सिविल सप्लाई कॉर्पोरेशन, अंत्यावसायी विकास निगम, गौ सेवा आयोग, आरडीए, कृषक कल्याण परिषद, पर्यटन मंडल, अरपा विकास प्राधिकरण और क्रेडा जैसी संस्थाओं में जगह पाने के लिए दावेदार पूरा जोर लगा रहे हैं। इन संस्थाओं के जरिए सीधे तौर पर विकास कार्यों और फंडिंग पर नियंत्रण होता है। इसके अलावा सरकार बीज विकास निगम, शाकम्भरी बोर्ड, भवन एवं सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल, हाउसिंग बोर्ड और राज्य वित्त आयोग जैसी संस्थाओं में सदस्य बनाकर मैदानी स्तर के कार्यकर्ताओं को एडजस्ट करने की रणनीति पर काम कर रही है।
मिशन 2028 के लिए खतरे की घंटी
राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि निगम मंडल में नियुक्ति केवल सम्मान का विषय नहीं है बल्कि यह संगठन के विस्तार और सरकारी योजनाओं को आम जनता तक पहुंचाने का एक अहम हथियार है। जिन भी नेताओं को यह जिम्मेदारी सौंपी जाएगी उन्हें अपना प्रभाव क्षेत्र बनाने और जनता के बीच मजबूत नेटवर्क खड़ा करने के लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता होगी। ऐसे में नियुक्तियों में जितनी देरी होगी इन पदों का राजनीतिक महत्व उतना ही शून्य होता जाएगा। पार्टी के उच्च स्तर तक यह रिपोर्ट पहुंच चुकी है कि खाली हाथ बैठे कार्यकर्ताओं में असंतोष पनप रहा है। यदि जल्द ही इन 300 पदों का पिटारा नहीं खुला तो यह असंतोष चुनाव में भारी पड़ सकता है।
