यूनिवर्सिटी के दागी अब राजभवन की शरण में, जांच शुरू करने से पहले राज्यपाल से लेनी होगी अनुमति
रायपुर। छत्तीसगढ़ की सरकारी यूनिवर्सिटी में अब भ्रष्ट अधिकारियों और कामचोर कर्मचारियों की चांदी होने वाली है। राजभवन ने एक ऐसा आदेश निकाला है जिसे सुनकर घोटालेबाज खुशी से झूम उठेंगे। अब अगर किसी प्रोफेसर या बाबू के खिलाफ जांच शुरू करनी है, तो पहले राज्यपाल से लिखित में इजाजत लेनी होगी। इतना ही नहीं, अगर जांच पूरी हो गई और दोषी को सजा देनी है, तब भी फाइल पहले राजभवन जाएगी। इस नए नियम के बाद अब यूनिवर्सिटी के कामकाज में राज्य सरकार और राजभवन के बीच अधिकारों की जंग छिड़ना तय है।
साहब की मर्जी बिना पत्ता भी नहीं हिलेगा
अब तक का नियम यह था कि कुलपति के बड़े मामलों को राज्यपाल देखते थे और नीचे के कर्मचारियों पर राज्य सरकार नकेल कसती थी। लेकिन नए फरमान ने पूरा खेल ही पलट दिया है। अब कुलसचिव को छोड़कर बाकी किसी भी छोटे-बड़े कर्मचारी पर हाथ डालने से पहले अनुमति का लंबा इंतजार करना होगा। जानकारों का कहना है कि यह नियम सिस्टम को सुधारने के लिए है या जांच की फाइलों को ठंडे बस्ते में डालने के लिए, यह तो वक्त ही बताएगा।
घोटालों की जांच पर अब लटका ताला
इस नए आदेश ने उन जांचों पर पानी फेर दिया है जो अभी जोरों पर चल रही थीं। इंदिरा गांधी कृषि यूनिवर्सिटी का मशहूर बीज घोटाला हो या बिलासपुर की अटल यूनिवर्सिटी में भ्रष्टाचार का मामला, सब अब राजभवन की हरी झंडी के भरोसे हैं। लोहारकोट कॉलेज में जेम पोर्टल से हुई सवा करोड़ की संदिग्ध खरीदी की फाइल भी अब धूल फांकेगी। कुल मिलाकर अब भ्रष्टाचारियों को पकड़ने से पहले लंबी कागजी कार्यवाही की भूलभुलैया से गुजरना होगा।
इस बदलाव के बाद यूनिवर्सिटी के गलियारों में चर्चा है कि जब तक ऊपर से आदेश आएगा, तब तक सबूत और गवाह दोनों गायब हो चुके होंगे। प्रशासन का तर्क है कि वह नियमों का पालन कर रहा है, लेकिन आम जनता इसे सजा से बचने का नया रास्ता मान रही है।

