इस विभाग के अधिकार क्षेत्र की हाई कोर्ट ने तय की सीमा, सिंगल बेंच के आदेश को रखा बरकरार

इस विभाग के अधिकार क्षेत्र की हाई कोर्ट ने तय की सीमा, सिंगल बेंच के आदेश को रखा बरकरार

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पिछड़ा वर्ग आयोग के अधिकार क्षेत्र को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग किसी निजी कारोबारी लेन-देन से जुड़े विवाद में एक पक्ष की देनदारी तय कर दूसरे पक्ष को रकम का भुगतान कराने का आदेश नहीं दे सकता। आयोग की भूमिका मुख्य रूप से सलाह और सिफारिश तक सीमित है।

मामला कांकेर जिले के ग्राम चिनौरी निवासी दुष्यंत प्रकाश नाग और दुर्ग स्थित कमला मोटर्स के संचालक कैलाश बारमेचा के बीच हार्वेस्टर मशीन की खरीद से जुड़ा है। दुष्यंत ने प्रीत हार्वेस्टर मॉडल 4949 खरीदने के लिए 21 लाख रुपये का सौदा किया था। उन्होंने 30 हजार रुपये अग्रिम और बाकी 20.70 लाख रुपये तीन डिमांड ड्राफ्ट के जरिए 9 सितंबर 2020 को चुका दिए थे। दुष्यंत का आरोप था कि पूरी रकम लेने के बाद भी उन्हें तय मॉडल की मशीन नहीं दी गई। कई बार डिलीवरी की तारीख बताने के बाद 22 अक्टूबर 2020 को उन्हें दूसरे मॉडल से जुड़े दस्तावेज दिए गए। इसके बाद उन्होंने दुर्ग सिटी कोतवाली में शिकायत की और बाद में छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग में मामला रखा।

आयोग ने की थी मुआवजा देने की सिफारिश, सिंगल बेंच ने आदेश किया था रद्द

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आयोग ने दुष्यंत के बयान और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद माना कि हार्वेस्टर की डिलीवरी में देरी और अलग मॉडल की आपूर्ति से उन्हें नुकसान हुआ। आयोग ने कमला मोटर्स के संचालक से मुआवजे की राशि वसूलकर दुष्यंत को देने की सिफारिश की। साथ ही दुर्ग कलेक्टर को आवश्यक कार्रवाई कर राशि की वसूली और भुगतान कराने के लिए कहा। कमला मोटर्स के संचालक ने आयोग के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी। सिंगल बेंच ने आयोग के आदेश को रद्द कर दिया था। इसके खिलाफ दुष्यंत ने डिवीजन बेंच में अपील दायर की।

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आयोग नहीं बन सकता सिविल कोर्ट- हाई कोर्ट

डिवीजन बेंच ने अपील खारिज करते हुए कहा कि पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1995 के तहत आयोग के अधिकार सलाहकारी और सिफारिशी प्रकृति के हैं। जांच के लिए आयोग को सिविल कोर्ट जैसी कुछ शक्तियां जरूर दी गई हैं, लेकिन इससे आयोग सिविल कोर्ट नहीं बन जाता। कोर्ट ने कहा कि आयोग किसी निजी विवाद में किसी व्यक्ति की निश्चित देनदारी तय कर सरकारी अधिकारी के माध्यम से रकम वसूलकर दूसरे निजी पक्ष को भुगतान नहीं करा सकता। आदेश को सिर्फ 'सिफारिश' कह देने से उसकी वास्तविक प्रकृति नहीं बदलती।

हाई कोर्ट ने माना कि हार्वेस्टर की बिक्री से जुड़ा यह मामला मूल रूप से निजी कारोबारी लेन-देन का विवाद था। आयोग अपनी जांच और सिफारिश तक सीमित रह सकता था, लेकिन निश्चित रकम की वसूली और भुगतान का निर्देश देकर उसने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया। डिवीजन बेंच ने 17 जून 2026 के सिंगल बेंच के आदेश को बरकरार रखते हुए दुष्यंत प्रकाश नाग की अपील खारिज कर दी।

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