रायपुर में सिस्टम का अंधेर': 3.40 करोड़ मंजूर, फिर भी 6 महीने से फाइलों में कैद संतोषी नगर-भरेंगाभाठा स्ट्रीट लाइट प्रोजेक्ट; अंधेरे में 40 से ज्यादा हादसे

रायपुर में सिस्टम का अंधेर': 3.40 करोड़ मंजूर, फिर भी 6 महीने से फाइलों में कैद संतोषी नगर-भरेंगाभाठा स्ट्रीट लाइट प्रोजेक्ट; अंधेरे में 40 से ज्यादा हादसे

रायपुर (NJV News): राजधानी रायपुर से लगे पुराने धमतरी रोड पर सरकारी सिस्टम की बड़ी लापरवाही और लोक निर्माण विभाग (PWD) की लालफीताशाही का एक जीता-जागता उदाहरण सामने आया है। संतोषी नगर से भरेंगाभाठा तक के मार्ग को रोशन करने के लिए 6 महीने पहले 3 करोड़ 40 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि स्वीकृत की गई थी, लेकिन यह रकम आज भी फाइलों में धूल फांक रही है। नतीजा यह है कि रोजाना इस मार्ग से गुजरने वाले लाखों वाहन चालक अंधेरे में जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर हैं।

 

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बिना लाइट की सड़क और जर्जर होते पुल

 

वर्ष 2018 में पीडब्ल्यूडी ने इस सड़क का नवनिर्माण कर आवागमन को सुगम तो बना दिया, लेकिन विभाग के जिम्मेदार इंजीनियर बोरियाखुर्द से ग्राम कोलर तक स्ट्रीट लाइट लगाना ही "भूल" गए। जनता की भारी मांग और जनप्रतिनिधियों के दबाव के बाद बजट तो मिल गया, लेकिन अब तक टेंडर प्रक्रिया तक शुरू नहीं हो सकी है। विभाग की इस घोर लापरवाही के कारण अब तक इस मार्ग पर 40 से अधिक छोटे-बड़े सड़क हादसे हो चुके हैं।

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इतना ही नहीं, सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर भी अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मुजगहन और सेजबहार के पास बनाए गए पुलों की ऊपरी सतह अभी से जर्जर हो चुकी है। गड्ढे उभर आए हैं और कई जगह तो लोहे की छड़ें (सरिया) तक बाहर झांक रही हैं। जिला पंचायत की सामान्य सभा में भी यह मुद्दा गूंज चुका है, लेकिन PWD के अफसरों की नींद नहीं टूट रही है।

इस पूरे मामले में रायपुर PWD के ईई (EE) राजीव नशीने का रटा-रटाया सरकारी जवाब सामने आया है। उनका कहना है, *"संभावना है कि 3 महीने में काम शुरू हो जाएगा। इसके लिए लगातार प्रयास किया जा रहा है।"*

 

फाइलों के बोझ तले दबी जनसुरक्षा और बेलगाम अफसरशाही

 

राजधानी रायपुर के संतोषी नगर से भरेंगाभाठा मार्ग की यह स्थिति केवल एक सड़क के अंधेरे में डूबे होने की खबर नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ में अफसरशाही की उस कार्यसंस्कृति का एक खौफनाक विश्लेषण है, जहां जनता की जान की कीमत सरकारी फाइलों की सुस्त चाल से भी कम आंकी जा रही है। 3.40 करोड़ रुपये जैसी बड़ी राशि का 6 महीने तक बिना उपयोग के पड़े रहना हमारे सिस्टम की गंभीर बीमारी को उजागर करता है।

 

 

डीपीआर (DPR) की भारी चूक और इंजीनियरिंग पर सवाल

 

 सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यह है कि साल 2018 में जब करोड़ों की लागत से नई सड़क का निर्माण किया गया, तो क्या उसकी 'डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट' (DPR) बनाने वाले इंजीनियरों को यह नहीं पता था कि इतनी व्यस्त सड़क पर रोशनी की भी जरूरत होगी? बोरियाखुर्द से कोलर तक के हिस्से में स्ट्रीट लाइट का प्रावधान ही भूल जाना कोई सामान्य मानवीय भूल नहीं, बल्कि घोर तकनीकी और प्रशासनिक लापरवाही है। अब उसी गलती को सुधारने के लिए 3.40 करोड़ रुपये अलग से मांगे गए, जो जनता की गाढ़ी कमाई का ही पैसा है।

 

 जानलेवा लालफीताशाही और 40 हादसों का जिम्मेदार कौन?

 

फंड स्वीकृत होने के बाद भी 6 महीने तक टेंडर न निकाल पाना PWD की उस लेटलतीफी को दर्शाता है जो अब जानलेवा साबित हो रही है। खबर के मुताबिक इस मार्ग पर अब तक 40 से अधिक हादसे हो चुके हैं। सवाल यह उठता है कि इन हादसों में जिन लोगों ने अपनी गाड़ियां तोड़ी हैं, जिन्हें गंभीर चोटें आई हैं, क्या उनका मुआवजा PWD के उन अधिकारियों की सैलरी से काटा जाएगा जो महीनों तक टेंडर की फाइल दबाकर बैठे हैं? जवाब है- नहीं। क्योंकि हमारे सिस्टम में जवाबदेही (Accountability) तय करने का कोई ठोस पैमाना ही नहीं बचा है।

 

जनप्रतिनिधियों की बेबसी और बेलगाम सिस्टम

 

यह मामला लोकतंत्र के उस दुखद पहलू को भी सामने लाता है जहां चुने हुए जनप्रतिनिधि नौकरशाही के सामने असहाय नजर आते हैं। क्षेत्रीय विधायक से लेकर जिला पंचायत सदस्य तक लगातार इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। जिला पंचायत की सामान्य सभा, जो कि जिले के विकास की सर्वोच्च बैठकों में से एक मानी जाती है, वहां मुद्दा उठने के बाद भी PWD के कानों पर जूं न रेंगना यह साबित करता है कि अफसरशाही पूरी तरह से बेलगाम हो चुकी है।

 

भ्रष्टाचार की आहट देते जर्जर पुल

 

सड़क के साथ-साथ मुजगहन और सेजबहार के पुलों का कुछ ही सालों में जर्जर हो जाना, छड़ों का बाहर आ जाना सिर्फ मेंटेनेंस की कमी नहीं है। यह सीधे तौर पर निर्माण के दौरान हुए भ्रष्टाचार और घटिया सामग्री के इस्तेमाल की ओर इशारा करता है। बिना कमीशन के ऐसी सड़कें और पुल पास नहीं होते, जो कुछ ही सालों में दम तोड़ दें।

 

पीडब्ल्यूडी के ईई का यह कहना कि संभावना है 3 महीने में काम शुरू हो जाएगा, जले पर नमक छिड़कने जैसा है। 6 महीने पहले से पैसा पास है और अफसर अब भी 'संभावनाओं' और 'प्रयासों' का झुनझुना थमा रहे हैं। जब तक ऐसे मामलों में देरी करने वाले अधिकारियों पर सीधी विभागीय कार्रवाई नहीं होगी और उनके सीआर (CR) खराब नहीं किए जाएंगे, तब तक राजधानी की सड़कें इसी तरह अंधेरे और हादसों का शिकार होती रहेंगी। 

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