17 करोड़ के सर्पदंश घोटाले में बड़ा प्रश्न: फर्जी पोस्टमार्टम से भुगतान तक किस-किस ने निभाई भूमिका?

17 करोड़ के सर्पदंश घोटाले में बड़ा प्रश्न: फर्जी पोस्टमार्टम से भुगतान तक किस-किस ने निभाई भूमिका?

बिलासपुर। न्यायधानी में सामने आए 17.24 करोड़ रुपये के सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच लगातार नए खुलासे कर रही है। एसडीएम और तहसीलदार कार्यालय के तीन क्लर्कों के खिलाफ अपराध दर्ज कर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया है। इन कर्मचारियों पर आरोप है कि इन्होंने फर्जी सर्पदंश प्रकरण दर्ज कर सरकारी रिकॉर्ड तैयार किए, जिसके आधार पर लाखों रुपये का मुआवजा जारी कराया गया। लेकिन इस मामले में बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या इतने बड़े गबन में सिर्फ क्लर्क ही दोषी हैं? फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट से लेकर मुआवजा मंजूरी तक किन-किन लोगों ने आंखें मूंदी?

थाने से छूटी डॉक्टर, मुंबई के वकील और मिली अग्रिम जमानत

जांच में नागपुर में निवास रत एक महिला डॉक्टर की भूमिका सामने आई। महिला डॉक्टर के खिलाफ अपराध दर्ज करने के बाद उसे गिरफ्तार किया गया था। लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के किसी बड़े नेता का फोन आने से उसे थाने से ही छोड़ दिया गया। इसके बाद उस महिला डॉक्टर को जिला एवं सत्र न्यायालय से इतने गंभीर मामले में जमानत भी दे दी गई। अमूमन सेशन न्यायालय से ऐसे प्रकरण में अग्रिम जमानत नहीं देते, परन्तु इस मामले में आसानी से अग्रिम जमानत दे दी गई। पैरवी करने के लिए मुंबई के अधिवक्ता महोदय आए थे। इससे पहले मामले में एक ड्राइवर, वकीलों और अन्य लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

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अकेले काम नहीं करती पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पूरी सरकारी प्रक्रिया पर सवाल

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विधानसभा में विधायक सुशांत शुक्ला के द्वारा मामला उठने के बाद इसकी उच्चस्तरीय जांच शुरू हुई। जांच के अनुसार, सामान्य मौतों को सर्पदंश से हुई मौत बताया गया और फर्जी मामलों के जरिए करीब 17.24 करोड़ रुपये का मुआवजा निकाला गया। यह काम संगठित तरीके से किया गया।

मुआवजा पाने के लिए केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट ही काफी नहीं होती। पुलिस पंचनामा, नजरी नक्शा, तहसील जांच, एसडीएम की मंजूरी और कोषालय से भुगतान—यह एक लंबी पूरी सरकारी प्रक्रिया है। इतने स्तरों पर फाइलों की जांच के बावजूद फर्जीवाड़ा कैसे चलता रहा? पुलिस विवेचकों द्वारा तैयार किए गए नजरी नक्शा, जिसके आधार पर पंचनामा तैयार कर पुलिस द्वारा पोस्टमार्टम के लिए दिया जाता है, उसकी भी गहन सूक्ष्मता से जांच किए जाने की जरूरत है। पुलिस, तहसील, एसडीएम कार्यालय और कोषालय इतने टेबलों से गुजरने के बाद ही सरकारी मुआवजा हासिल किया जाता है।

बिचौलियों की भूमिका ?

अब तक इस पूरे मामले में 14 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं। कई डॉक्टरों, राजस्व कर्मचारियों, वकीलों व अन्य लोगों से पूछताछ जारी है। इसके अलावा अन्य बिचौलिए आरोपियों की भूमिका भी सामने आई है। अधिकारियों का कहना है कि जांच अभी जारी है। पुलिस और तहसील कार्यालय से जुड़े तहसीलदार तथा कुछ अन्य कर्मचारियों की भूमिका की पड़ताल हो रही है। जैसे-जैसे नए सबूत मिलेंगे, मामले में शामिल अन्य लोगों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।बड़ा सवाल यही है कि क्या पुलिस, राजस्व और प्रशासन के उच्च स्तर पर बैठे लोगों की जानकारी के बिना 17 करोड़ का यह गबन और फाइलों का यह सफर तय हो सकता था?

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