छत्तीसगढ़ पॉलिटिक्स: खरमास खत्म होते ही सत्ता के शीर्ष पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' की तैयारी! 'गुजरात फॉर्मूले' के खौफ के बीच डॉ. रमन सिंह की वापसी की जोरदार चर्चा

छत्तीसगढ़ पॉलिटिक्स: खरमास खत्म होते ही सत्ता के शीर्ष पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' की तैयारी! 'गुजरात फॉर्मूले' के खौफ के बीच डॉ. रमन सिंह की वापसी की जोरदार चर्चा

रायपुर: छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों खामोशी के पीछे एक बड़े तूफान की आहट सुनाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों और सत्ता के गलियारों (Power Corridors) में यह चर्चा आम है कि 'खरमास' (मलमास) के खत्म होते ही प्रदेश के नेतृत्व और सत्ता के स्वरूप में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकता है। दिल्ली आलाकमान के पास पहुंच रही ग्राउंड रिपोर्ट्स के बाद अब संकेत मिल रहे हैं कि हाई कमान राज्य में कोई कड़ा फैसला लेने के मूड में है। चर्चा 'गुजरात फॉर्मूले' से लेकर प्रदेश के कद्दावर नेता डॉ. रमन सिंह की सक्रिय राजनीति में वापसी तक की हो रही है।

क्यों महसूस की जा रही है बदलाव की दरकार?

दरअसल, पिछले कुछ समय से प्रदेश सरकार के कामकाज और जमीनी हकीकत को लेकर दिल्ली तक जो फीडबैक पहुंच रहा है, वह आलाकमान के लिए चिंता का विषय है। सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरी है।

बेलगाम अफसरशाही (Bureaucracy)।

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता और प्रशासन के बीच जो समन्वय होना चाहिए, वह वर्तमान में नदारद है। मंत्रियों की पकड़ ढीली होने के कारण लालफीताशाही (Red-tapism) हावी हो गई है, जिससे जनहित के फैसले फाइलों में दम तोड़ रहे हैं। ग्राउंड लेवल पर भ्रष्टाचार की शिकायतें और जनता-सरकार के बीच टूटता संवाद, आगामी चुनावों के लिहाज से भाजपा के लिए एक बड़ा 'रेड फ्लैग' है।

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क्या है दिल्ली की रणनीति? 'गुजरात पैटर्न' का खौफ

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अपनी चौंकाने वाली रणनीतियों के लिए जाना जाता है। प्रदेश के सियासी हलकों में इस बात का खौफ है कि कहीं दिल्ली यहां भी गुजरात पैटर्न' लागू न कर दे।

 क्या है यह पैटर्न? इस फॉर्मूले के तहत बिना किसी पूर्व सूचना के पूरी कैबिनेट या शीर्ष नेतृत्व को बदल दिया जाता है। इसका उद्देश्य सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) को काटना और संगठन में नई ऊर्जा का संचार करना होता है।

हालांकि, छत्तीसगढ़ के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए यह एक बड़ा जोखिम भी साबित हो सकता है।

ट्रबलशूटर के रूप में डॉ. रमन सिंह की वापसी की सुगबुगाहट

गुजरात पैटर्न के भारी जोखिम के बीच आलाकमान के सामने एक दूसरा और बेहद सुरक्षित विकल्प पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह  के रूप में है। खबर है कि हाई कमान का एक धड़ा राज्य को प्रशासनिक अराजकता से निकालने के लिए डॉ. रमन के 15 सालों के बेदाग और ठोस अनुभव पर दांव लगाने की वकालत कर रहा है।

डॉ. रमन सिंह ही क्यों?

 प्रशासन पर पकड़: उनके कार्यकाल में ब्यूरोक्रेसी कभी राजनीतिक नेतृत्व पर हावी नहीं हो सकी।

संतुलन के माहिर: डॉ. रमन सिंह संगठन के तमाम गुटों को साधने और असंतोष को खत्म करने में माहिर माने जाते हैं।

 जनता में स्वीकार्यता: चाऊर वाले बाबा' के रूप में उनकी छवि आज भी ग्रामीण छत्तीसगढ़ में बेहद मजबूत है।

आगे क्या हो सकता है 

दिल्ली आलाकमान इस वक्त एक बेहद बारीक लकीर पर चल रहा है। एक ओर नए चेहरों के साथ प्रयोग (गुजरात मॉडल) का विकल्प है, तो दूसरी ओर एक आजमाए हुए अनुभवी चेहरे (डॉ. रमन सिंह) के जरिए 'कोर्स करेक्शन' करने की जरूरत।

खरमास के बाद का समय छत्तीसगढ़ भाजपा के लिए बेहद क्रूशियल होने वाला है। बदलाव केवल चेहरों का होगा या पूरी व्यवस्था का, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन एक बात तय है कि दिल्ली अब मूकदर्शक बनकर नुकसान सहने के मूड में नहीं है। बदलाव की इस बयार का सीधा असर 2028 के रोडमैप पर पड़ेगा।

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