बीएनएसएस लागू हुए दो साल बीते: लोक अभियोजन विभाग अब भी 'प्रभारी' के भरोसे; नियम 15 साल की वकालत का, कुर्सी पर बैठे हैं पुलिस अफसर

बीएनएसएस लागू हुए दो साल बीते: लोक अभियोजन विभाग अब भी 'प्रभारी' के भरोसे; नियम 15 साल की वकालत का, कुर्सी पर बैठे हैं पुलिस अफसर

रायपुर | देश में नए आपराधिक कानून लागू हुए लगभग दो वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 के प्रावधानों का अब तक पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हो सका है। गृह विभाग के अधीन चलने वाले लोक अभियोजन विभाग में आज तक कानून के अनुरूप नियमित लोक अभियोजन निदेशक की नियुक्ति नहीं हो पाई है। वर्तमान में विभाग का संचालन प्रभारी व्यवस्था के तहत डीआईजी स्तर के एक पुलिस अधिकारी के भरोसे चल रहा है।

कानून में क्या है पात्रता और राज्य में क्या है स्थिति?

बीएनएसएस की धारा 20(2) (a) के अनुसार, लोक अभियोजन निदेशक अथवा उप लोक अभियोजन निदेशक के पद पर वही व्यक्ति नियुक्त किया जा सकता है, जिसने कम-से-कम 15 वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में विधि व्यवसाय किया हो अथवा जो सत्र न्यायाधीश रहा हो। नए कानून का उद्देश्य अभियोजन व्यवस्था को पुलिस तंत्र से अलग कर एक स्वतंत्र, पेशेवर और विधिक विशेषज्ञता वाला नेतृत्व प्रदान करना है।

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जानकारी के अनुसार, छत्तीसगढ़ में पिछले 6 वर्षों से इस विभाग का नेतृत्व पुलिस कैडर के वरिष्ठ अधिकारियों के पास रहा है। नए कानून के लागू होने के बाद यह अपेक्षा थी कि विभाग को विधिक पृष्ठभूमि वाला नियमित निदेशक मिलेगा, लेकिन दो वर्ष बीत जाने के बाद भी नियुक्ति नहीं हो सकी है। सवाल उठ रहे हैं कि जब कानून ने पात्रता निर्धारित कर दी है, तब उसके अनुरूप नियुक्ति में इतनी देरी क्यों हो रही है?

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केंद्र सरकार की टीम के निर्देश भी दरकिनार

करीब एक वर्ष पूर्व, नए आपराधिक कानूनों के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए केंद्र सरकार के अधिकारियों की एक टीम ने छत्तीसगढ़ का दौरा किया था। टीम ने लोक अभियोजन विभाग का निरीक्षण कर निदेशालय में आवश्यक पदों पर शीघ्र नियमित नियुक्तियां सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद आज तक इन पदों पर नियुक्तियां नहीं हो सकीं हैं।

400 न्यायालय, लेकिन अभियोजन अधिकारी सिर्फ आधे

लोक अभियोजन विभाग अधिकारियों की भारी कमी से भी जूझ रहा है। राज्य में लगभग 400 न्यायालयों में अभियोजन कार्य संचालित हो रहा है, जबकि विभाग में केवल 200 से 300 अभियोजन अधिकारी ही उपलब्ध हैं। परिणामस्वरूप, कई जगहों पर एक ही अधिकारी को दो से तीन न्यायालयों का कार्य संभालना पड़ रहा है। वर्ष 2025 में गृह विभाग ने अधिसूचना जारी कर सत्र न्यायालयों में सरकारी अधिवक्ताओं की नियुक्ति नियमित अभियोजन कैडर से किए जाने की व्यवस्था की थी। इसके बावजूद बड़ी संख्या में पद अब भी रिक्त हैं, जिससे विभाग पर कार्यभार लगातार बढ़ रहा है।

प्रभारी व्यवस्था से नीति-निर्माण पर असर की आशंका

लोक अभियोजन विभाग राज्य सरकार की ओर से हत्या, दुष्कर्म, भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराध के मामलों में न्यायालयों में अभियोजन का संचालन करता है। पुलिस की चार्जशीट का परीक्षण करना, गवाहों-साक्ष्यों की प्रस्तुति और जमानत एवं अपील में राज्य का पक्ष रखना विभाग की जिम्मेदारी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित निदेशक नहीं होने से विभाग के प्रशासनिक नेतृत्व, नीति-निर्माण, प्रशिक्षण, कार्य समीक्षा और समन्वय पर असर पड़ सकता है। हालांकि, न्यायालयों में नियमित अभियोजन कार्य फिलहाल प्रभारी व्यवस्था के माध्यम से ही जारी है।

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