सर्वाइकल कैंसर: मेकाहारा में हर साल 460 मरीज; बच्चियों को बचाने मुफ्त टीका आया, लेकिन रायपुर में लगवाने वाले ही नहीं

सर्वाइकल कैंसर: मेकाहारा में हर साल 460 मरीज; बच्चियों को बचाने मुफ्त टीका आया, लेकिन रायपुर में लगवाने वाले ही नहीं

 

रायपुर। छत्तीसगढ़ में पहली बार सर्वाइकल कैंसर (बच्चेदानी के मुंह का कैंसर) से बचाव के लिए बड़ा अभियान शुरू हुआ है। सरकार मुफ्त में एचपीवी (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) वैक्सीन लगा रही है। लेकिन राजधानी रायपुर में इस टीके की रफ्तार एकदम सुस्त है। अब तक 25 से कुछ ही ज्यादा बच्चियों को यह टीका लगा है। पैरेंट्स में जानकारी का अभाव है। उल्टे कई तरह के भ्रम फैले हैं, जिस कारण वे अपनी बच्चियों को अस्पताल नहीं ला रहे हैं।

खतरा बड़ा: महिलाओं में सबसे ज्यादा यही कैंसर

बीमारी कितनी खतरनाक है, इसका अंदाजा रायपुर के अंबेडकर अस्पताल (मेकाहारा) के आंकड़ों से लगता है। यहां हर साल सर्वाइकल कैंसर के करीब 460 नए मरीज इलाज के लिए आते हैं। अस्पताल पहुंचने वाले कुल कैंसर मरीजों में 20 फीसदी सर्वाइकल कैंसर के ही होते हैं। छत्‍तीसगढ़ की महिलाओं में यह कैंसर पहले नंबर पर है। इसके बावजूद बचाव के इस फ्री टीके को लेकर लोग गंभीर नहीं हैं।

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एक्सपर्ट की राय: शादी से पहले टीका जरूरी

अंबेडकर अस्पताल के डीन और कैंसर विशेषज्ञ डॉ. विवेक चौधरी बताते हैं कि यह बीमारी ह्यूमन पैपिलोमा वायरस के स्ट्रैन 16 और 18 से होती है।

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  सही उम्र: 9 से 14 साल की बच्चियों को यह टीका लगना चाहिए।
  फायदा: शादी से पहले या यौन संबंध बनने से पहले वैक्सीन लगने से इम्युनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) बढ़ती है।
 असर: इसके कुल 3 डोज लगते हैं। अगर सही समय पर यह टीका लगे, तो 90 प्रतिशत महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर को रोका जा सकता है।
बाजार में जो टीका हजारों का, वह यहां मुफ्त

सरकार पहली बार यह वैक्सीन मुफ्त लगा रही है। प्राइवेट अस्पतालों में इस वैक्सीन के एक डोज की कीमत 2000 से 4000 रुपए तक होती है। तीन डोज का पूरा खर्च 10 हजार रुपए के पार जाता है।

अभी यह फ्री टीका रायपुर के कालीबाड़ी स्थित मातृशिशु अस्पताल समेत सभी जिला अस्पतालों में लगाया जा रहा है।

 किसे लगेगा: फिलहाल फोकस उन किशोरियों पर है जो 14 साल की हो गई हैं, लेकिन 15 साल की नहीं हुई हैं।

  समय: बच्चियां सुबह 9 बजे से दोपहर 2 बजे तक अस्पताल जाकर मुफ्त में टीकाकरण करवा सकती हैं।

हजारों की वैक्सीन फ्री, फिर भी टीकाकरण सुस्त क्यों?

राजधानी में वैक्सीनेशन का यह हाल सिस्टम की नाकामी और लोगों की लापरवाही दोनों की पोल खोलता है। जब महिलाओं में सबसे ज्यादा मौतें सर्वाइकल कैंसर से हो रही हैं, तो सिर्फ वैक्सीन मंगा कर रख लेना काफी नहीं है।

  अभियान सिर्फ कागजों पर: स्वास्थ्य विभाग ने वैक्सीन अस्पतालों में पहुंचा दी, लेकिन इसका प्रचार जीरो है। शहर की आधी से ज्यादा आबादी को पता ही नहीं है कि सर्वाइकल कैंसर का कोई फ्री टीका लग रहा है।

 स्कूलों में कैंप क्यों नहीं? इस टीके का टारगेट ग्रुप 14 साल की बच्चियां हैं। ये बच्चियां आसानी से स्कूलों में मिल सकती हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीमों को सीधे स्कूलों में कैंप लगाना चाहिए था। सिर्फ अस्पताल के भरोसे बैठे रहने से टारगेट पूरा नहीं होगा।

 भ्रम दूर करने में सिस्टम फेल: पैरेंट्स के मन में वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स को लेकर डर है। विभाग ने इस डर को दूर करने और जागरूकता फैलाने के लिए कोई ठोस अवेयरनेस प्रोग्राम नहीं चलाया।

 तैयारी युद्ध स्तर पर हो: हर साल सिर्फ एक अस्पताल (मेकाहारा) में 460 मरीज आ रहे हैं। अगर इस बीमारी को जड़ से खत्म करना है, तो कोरोना और पल्स पोलियो अभियान की तरह आक्रामक रणनीति बनानी होगी। इस सुस्त रवैये से कैंसर जैसी बड़ी जंग नहीं जीती जा सकती।

 

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