तेंदूपत्ता का काला खेल: 6900 का बोरा 3000 में बेचा, अफसरों की सेटिंग ने निगल ली 1600 करोड़ की एफडी, अब संघ पर 450 करोड़ के कर्ज में

तेंदूपत्ता का काला खेल: 6900 का बोरा 3000 में बेचा, अफसरों की सेटिंग ने निगल ली 1600 करोड़ की एफडी, अब संघ पर 450 करोड़ के कर्ज में

रायपुर। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के 'हरे सोने' यानी तेंदूपत्ता में भ्रष्टाचार का ऐसा दीमक लगा है कि पूरा वनोपज संघ ही खोखला हो गया है। जो खजाना कभी 1600 करोड़ रुपयों से भरा था, वो आज पूरी तरह खाली है। उलटा 450 करोड़ का भारी भरकम कर्ज माथे पर आ गया है। खेल सीधा और साफ है- 6900 रुपए की लागत वाला तेंदूपत्ते का बोरा गुपचुप तरीके से महज 3000 रुपए में अपने चहेतों को बेचा जा रहा था। जब इस खेल का भांडा फूटा तो अफसरों के पसीने छूट गए। आनन-फानन में टेंडर कैंसिल किए गए और रातों-रात वेबसाइट से रेट लिस्ट ही गायब कर दी गई।

 

12 साल में स्वाहा कर दिए 1600 करोड़

छत्तीसगढ़ के करीब 55 लाख आदिवासियों और ग्रामीणों की रोजी-रोटी इसी तेंदूपत्ता से चलती है। साल 2013-14 का वो वक्त था, जब वनोपज संघ के पास बैंकों में 1600 करोड़ रुपए की तगड़ी एफडी थी। तब संघ रईस हुआ करता था। लेकिन आज हालत ये है कि कर्मचारियों को सैलरी देने और रोजमर्रा का काम चलाने तक के लाले पड़े हैं। पिछले कुछ सालों के लगातार घाटे की भरपाई उसी एफडी को तुड़वाकर की जाती रही। नतीजा ये हुआ कि 12 सालों में 1600 करोड़ स्वाहा हो गए और किसी को भनक तक नहीं लगी। उल्टा काम चलाने के लिए 150 और फिर 300 करोड़ यानी कुल 450 करोड़ का बैंक लोन लेना पड़ा।

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औसत के नाम पर आंखों में झोंकी गई धूल

मीडिया की जांच में इस महाघोटाले की पूरी स्क्रिप्ट सामने आई है। सरकार आदिवासियों से 5500 रुपए प्रति बोरा के हिसाब से तेंदूपत्ता खरीदती है। पैकिंग और बाकी खर्च मिलाकर संघ को एक बोरे की लागत 6900 रुपए बैठती है। राज्य में कुल 954 लाट (एक लाट में डेढ़ लाख बोरे) बनते हैं और एक लाट की कीमत करीब 10 करोड़ होती है।

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इस साल जनवरी में 429 लाट बेचने का टेंडर निकाला गया। यहीं से असली खेल शुरू हुआ। अच्छी क्वालिटी का पत्ता तो 12 हजार में बिका, लेकिन कई लाट महज 3000 रुपए में बेच दिए गए। यानी लागत से आधे से भी कम कीमत में। अफसरों ने अंतर-विभागीय समिति को 'औसत कीमत' का झुनझुना पकड़ा दिया। उन्होंने कागजों में दिखाया कि औसत बिक्री 7800 रुपए प्रति बोरा हुई है, यानी संघ को प्रति बोरा 900 रुपए का मुनाफा हो रहा है। कम कीमत पर बिके बोरों की जानकारी आला अफसरों और मंत्रियों से छिपा ली गई।

उपाध्यक्ष ने टोका तो उड़े अफसरों के होश

30 जनवरी को तो 3000 वाले रेट को समिति से गुपचुप पास भी करवा लिया गया। लेकिन इसी बीच वनोपज संघ के उपाध्यक्ष यज्ञ दत्त शर्मा का माथा ठनक गया। उन्हें कम कीमत पर शंका हुई। उन्होंने जब अफसरों से सीधे सवाल-जवाब किए, तो उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

चोरी पकड़े जाने के डर से आनन-फानन में टेंडर निरस्त कर दिए गए। अगले ही दिन बिना वन मंत्री की मौजूदगी के (ऑनलाइन सहमति लेकर) दूसरी बैठक बुलाई गई। इसमें तय हुआ कि अब सिर्फ वही बोरे बिकेंगे जिनकी कीमत कम से कम 6300 रुपए तक आई हो। मजेदार बात ये है कि जब इसके बाद दूसरे और तीसरे टेंडर हुए, तो जो खराब क्वालिटी वाला पत्ता पहले 3000 में बेचा जा रहा था, वो 4500 में बिका। मतलब साफ है, पहले सीधे-सीधे 'कमीशन' की सेटिंग चल रही थी।

एमडी के बहाने: कोरोना और मौसम पर फोड़ा ठीकरा

अब जब संघ लुट चुका है, तो अफसर अजीबोगरीब बहाने बना रहे हैं। राज्य लघु वनोपज संघ के एमडी अनिल साहू से जब सीधे सवाल किए गए, तो उनके जवाब उनके रवैये की पोल खोलते हैं:

  •  सवाल: संघ अचानक इतने बड़े घाटे में कैसे चला गया?
  •    जवाब: कोरोना काल में बिक्री पर असर पड़ा था। (मानो कोरोना ने ही 1600 करोड़ का तेंदूपत्ता खा लिया हो!)
  • सवाल: 1600 करोड़ की एफडी कैसे खत्म हो गई?
  •    जवाब: कई बार तेंदूपत्ता मौसम की मार से खराब होता है, इसलिए अच्छे रेट नहीं आते।
  • सवाल: इस बार टेंडर में जो गड़बड़ी पकड़ी गई, उस पर क्या कहेंगे?
  •    जवाब: ये कोई गड़बड़ी नहीं है, सामान्य प्रक्रिया है। हमने रेट का संशोधन कर दिया है।

यानी 6900 का माल 3000 में लुटाना अफसरों के लिए एक 'सामान्य प्रक्रिया' है। अगर उपाध्यक्ष ने वक्त पर सवाल नहीं उठाए होते, तो ये 'सामान्य प्रक्रिया' आदिवासियों को पूरी तरह सड़क पर ले आती। 

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