400 करोड़ का प्रोजेक्ट 'एक्स-रे' खुद फाइलों में अटका ; मिट्टी की जांच हुई, मगर टेंडर को दिल्ली से हरी झंडी का इंतजार
रायपुर। शहर के व्यस्त हाईवे चौराहों को जाम से मुक्ति दिलाने के लिए तैयार किया गया प्रोजेक्ट 'एक्स-रे' दो साल बाद भी खुद फाइलों के जाम में फंसा हुआ है। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) ने 400 करोड़ रुपये का यह खाका खींचा था। कागजों पर दौड़ते इस प्रोजेक्ट की हकीकत यह है कि मिट्टी परीक्षण और डिजाइन का काम तो पूरा हो चुका है, लेकिन टेंडर की फाइल दिल्ली मुख्यालय में अटक कर रह गई है। नतीजा, हाईवे से गुजरने वाले लाखों वाहन रोज उसी पुरानी जाम की परेशानी झेलने को मजबूर हैं।
सिर्फ बजट तय करने में गुजारे कई महीने
विभाग ने बजट और फाइलें आगे बढ़ाने की कसरत में ही डेढ़ साल से ज्यादा का वक्त गुजार दिया। शहर अब आउटर तक फैल चुका है, नई कॉलोनियां हाईवे के किनारे बस रही हैं। इन चौकों से रोजाना लाखों गाड़ियां गुजरती हैं।
- यातायात सुगम बनाने के लिए 400 करोड़ की लागत से फ्लाईओवर का प्रस्ताव बना।
- टेंडर मंजूरी का प्रस्ताव एनएचएआई हेडक्वार्टर भेजा गया है, जहां से अभी तक स्वीकृति नहीं मिली है।
- काम शुरू होने की तो बात ही छोड़िए, अभी टेंडर की प्रक्रिया तक नहीं हो पाई है।
70 करोड़ का मुआवजा
प्रोजेक्ट के तहत निजी जमीन का अधिग्रहण भी किया जाना है। इसके एवज में करीब 70 करोड़ रुपये मुआवजे के तौर पर बांटे जाने का अनुमान है। सरकार को निर्माण के साथ जमीन पर भी मोटा पैसा खर्च करना है, फिर भी टेंडर अटका होने से अधिग्रहण की यह प्रक्रिया ठप पड़ी है। उद्योग भवन के सामने रिंग रोड के दोनों तरफ बड़ी आबादी रहती है। रोजाना हजारों लोग सड़क पार करके कॉलोनियों और शहर की तरफ आते-जाते हैं। दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ही यहां ओवरब्रिज बनाने का प्रस्ताव है।
तेलीबांधा चौक पर सबसे ज्यादा दबाव
इस पूरी योजना में सबसे ज्यादा ट्रैफिक का दबाव तेलीबांधा चौक पर है। एक्सप्रेस-वे, वीआईपी रोड, रिंग रोड और शहर के भीतर का ट्रैफिक इसी जगह आकर आपस में मिलता है।
- पीक आवर में हालात ऐसे हो जाते हैं कि कुछ किलोमीटर रेंगने में भी लंबा वक्त लग जाता है।
- इसी दिक्कत को दूर करने के लिए यहां प्रदेश का सबसे लंबा फ्लाईओवर बनाने की तैयारी है।
- अलग-अलग प्रस्तावों में इसकी लंबाई 1.5 से 3.5 किलोमीटर के बीच रखी गई है।
- इसे छह लेन का बनाया जाना है, लेकिन यह सब तभी संभव होगा जब दिल्ली से फाइल पास होगी।
राहत में लगेंगे 3 से 4 साल
जानकारों की मानें तो टेंडर पास होने के बाद भी कई अड़चनें बाकी हैं। निर्माण एजेंसी तय होगी, फिर जमीन ली जाएगी, वर्क ऑर्डर निकलेगा तब जाकर कहीं ईंट-गिट्टी का काम दिखेगा। यानी अगर आज टेंडर हो भी जाए, तो शहरवासियों को ट्रैफिक के इस झमेले से छुटकारा पाने में 3 से 4 साल का लंबा समय लग जाएगा।
मिट्टी परीक्षण का काम हो चुका है। टेंडर मंजूरी के लिए प्रस्ताव हेडक्वार्टर भेजा गया है। वहां से मंजूरी मिलते ही टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।" - दिग्विजय सिंह, प्रोजेक्ट डायरेक्टर, एनएचएआई
