सरोना ट्रेंचिंग यार्ड की ग्राउंड रिपोर्ट: 12.64 करोड़ स्वाहा, 2 साल बीते; फिर भी सीना ताने खड़ा है 'जहरीले' प्लास्टिक का पहाड़
रायपुर के सरोना ट्रेंचिंग यार्ड को कचरा मुक्त कर वहां 'ग्रीन जोन' बनाने का सपना, सरकारी लेटलतीफी और बहानों की भेंट चढ़ गया है। नगर निगम ने 12.64 करोड़ रुपए फूंक दिए, काम पूरा करने की डेडलाइन खत्म होने के बाद 6 महीने का एक्सटेंशन भी दे दिया, लेकिन नतीजा सिफर है। निगम की फाइलों में भले ही कचरे की 'वैज्ञानिक प्रोसेसिंग' पूरी हो चुकी हो, लेकिन हकीकत में सरोना में आज भी एक लाख टन से ज्यादा स्क्रीन प्लास्टिक का पहाड़ खड़ा है। इस पहाड़ से उठने वाली दुर्गंध और हवा में घुलते जहर ने आसपास के हजारों रहवासियों का सांस लेना मुश्किल कर दिया है।
करोड़ों का टेंडर, फिर भी अधूरा काम
सरोना की करीब 28 एकड़ जमीन पर 2019 तक शहर भर का कचरा डंप किया जाता था। हाईकोर्ट और एनजीटी की फटकार के बाद नया कचरा डालना तो बंद हो गया, लेकिन 4.5 लाख टन पुराने कचरे का निष्पादन गले की फांस बन गया। जुलाई 2023 में 12.64 करोड़ रुपए का वर्क ऑर्डर जारी कर 18 महीने में यार्ड को साफ करने का लक्ष्य रखा गया। ठेका कंपनी (हिल ब्रो मैटेलिक एंड कंस्ट्रक्शन लिमिटेड-इनवायरो ऑर्गेनिक) को 6 महीने का ग्रेस पीरियड भी मिला, फिर भी काम की रफ्तार कछुआ चाल ही रही और कचरे का पहाड़ पूरी तरह नहीं हट सका।
निगम का तर्क: कचरा नहीं, यह 'स्क्रीन प्लास्टिक' है
अधिकारियों का रटा-रटाया जवाब है कि सड़ने वाले कचरे से खाद बना ली गई है और उसका उपयोग फिलिंग में हो चुका है। अब जो पहाड़ दिख रहा है, वह प्रोसेसिंग के बाद बचा हुआ 'स्क्रीन प्लास्टिक' है। इसे सीमेंट फैक्ट्रियों में ईंधन के रूप में खपाया जाना था। लेकिन फैक्ट्रियों से कीमत पर विवाद और कम डिमांड का बहाना बनाकर इस जहरीले ढेर को जस का तस छोड़ दिया गया है।
एक्सपर्ट व्यू: टाइम बम बन चुका है यह यार्ड
डॉ. शम्श परवेज (एचओडी रसायनशास्त्र, पं.रविवि) के मुताबिक, प्लास्टिक कचरे का इतनी मात्रा में खुले में पड़ा रहना बेहद खतरनाक है। माइक्रो प्लास्टिक अब मिट्टी और हवा में मिलकर सांस के जरिए सीधे लोगों के ब्लड प्लाज्मा तक पहुंच रहा है। डंपिंग यार्ड के 5 किमी के दायरे में रहने वाले लोगों को डिमेंशिया, हार्ट-ब्रेन स्ट्रोक और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का सबसे ज्यादा खतरा है। वहीं, आग लगने की स्थिति में खतरनाक थैलेड कंपाउंड निकलता है, जो पूरे पर्यावरण को तबाह कर सकता है।
जिम्मेदारों की 'सीधी बात'
संबित मिश्रा, आयुक्त, नगर निगम रायपुर:
कचरे की वैज्ञानिक स्तर पर प्रोसेसिंग पूरी हो गई है। जो बचा है, वह प्रोसेस के बाद निकला प्लास्टिक है। बारिश के कारण गाड़ियां नहीं जा पा रही हैं और सीमेंट उद्योग में मांग कम होने से शिफ्टिंग अटकी है। जल्द ही इस बचे हुए काम को पूरा करके वहां मैन-मेड फॉरेस्ट (मानव निर्मित जंगल) और ग्रीन जोन बनाने का काम शुरू किया जाएगा।"
