मीना खलखो हत्याकांड: दो जवानों की रिहाई बरकरार, हाई कोर्ट ने राज्य की अपील की खारिज

मीना खलखो हत्याकांड: दो जवानों की रिहाई बरकरार, हाई कोर्ट ने राज्य की अपील की खारिज

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के चर्चित मीना खलखो हत्याकांड में बिलासपुर हाई कोर्ट ने दो सशस्त्र बल के जवानों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा है । डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि मीना खलखो की जान लेने वाली गोली आरोपी जवानों के हथियार से ही चली थी । केवल घटना के दौरान पुलिस फायरिंग होने और मीना की गोली लगने से मौत होने के आधार पर दोनों जवानों को हत्या का दोषी नहीं ठहराया जा सकता ।

जस्टिस संजय एस अग्रवाल और जस्टिस एन के व्यास की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया । इससे पहले रायपुर के द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 5 अप्रैल 2022 को धर्मदत्त धनिया और जीवनलाल रत्नाकर को धारा 302/34 के आरोप से संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था । इसी फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी ।

नक्सल सर्चिंग के दौरान हुई थी फायरिंग

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अभियोजन के मुताबिक 6 जुलाई 2011 की रात चंदो थाना क्षेत्र में नक्सलियों की मौजूदगी की सूचना पर पुलिस बल सर्चिंग के लिए निकला था । इसी दौरान पुलिस ने घात लगाई थी। रात करीब दो से तीन बजे के बीच पुलिस और नक्सलियों के बीच गोलीबारी हुई । फायरिंग खत्म होने के बाद मीना खलखो घायल अवस्था में मिली थी । उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई । घटना को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार ने 29 अगस्त 2011 को न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था । आयोग ने अपनी रिपोर्ट में मीना की मौत पुलिस फायरिंग से होने की बात कही थी । इसके बाद सीआईडी ने वर्ष 2015 में दोनों जवानों के खिलाफ हत्या और साझा आपराधिक मंशा के तहत मामला दर्ज किया ।

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घातक गोली किसकी थी, यही बना सबसे बड़ा सवाल

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि मेडिकल और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मीना की मौत गोली लगने से होना स्पष्ट है । गवाहों ने भी घायल मीना को घटनास्थल से अस्पताल ले जाने की पुष्टि की । फोरेंसिक जांच में गोली एसएलआर से चलने की बात सामने आने का दावा भी किया गया । हालांकि हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन यह साबित करने में नाकाम रहा कि जिस एसएलआर से गोली चली, वह आरोपी जवानों को ही आवंटित था । उनके हथियारों के आवंटन से संबंधित कोई ठोस दस्तावेज भी अदालत के सामने पेश नहीं किया गया । फोरेंसिक विशेषज्ञ जीएस साहू ने भी स्वीकार किया कि शरीर से बरामद गोली पुलिस के हथियार से चली थी या नक्सलियों के हथियार से, वह निश्चित तौर पर नहीं बता सकते ।

धारा 106 की दलील भी नहीं आई काम

राज्य सरकार ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 का हवाला देते हुए कहा कि हथियार और घटना से जुड़ी विशेष परिस्थितियां आरोपियों की जानकारी में थीं, इसलिए उन्हें इसका स्पष्टीकरण देना चाहिए था । हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया । कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 106 अभियोजन की मूल जिम्मेदारी को खत्म नहीं करती । पहले अभियोजन को ऐसे बुनियादी तथ्य साबित करने होंगे, जिनसे आरोपियों की संलिप्तता का उचित निष्कर्ष निकले । जब यह ही साबित नहीं हुआ कि जानलेवा गोली आरोपियों के हथियार से चली थी, तो धारा 106 के आधार पर आरोपियों पर दोष का भार नहीं डाला जा सकता ।

बरी किए जाने के फैसले में दखल का आधार नहीं

हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण करने के बाद दोनों जवानों को संदेह का लाभ दिया था । उसका फैसला न तो विकृत है और न ही साक्ष्यों की अनदेखी पर आधारित है । सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए डिवीजन बेंच ने कहा कि किसी आरोपी को बरी किए जाने के फैसले में अपीलीय अदालत तभी हस्तक्षेप कर सकती है, जब निचली अदालत का निष्कर्ष स्पष्ट रूप से गलत या विकृत हो और उपलब्ध साक्ष्यों से आरोपी की दोषसिद्धि के अलावा कोई दूसरा उचित निष्कर्ष संभव न हो । हाई कोर्ट ने माना कि मीना खलखो हत्याकांड में ऐसी स्थिति नहीं है । इसी आधार पर कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए दोनों जवानों को बरी किए जाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा ।

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