रेलवे की कार्रवाई पर हाई कोर्ट सख्त, मूल सजा देने वाले अधिकारी को ही पुनर्विचार का अधिकार

रेलवे की कार्रवाई पर हाई कोर्ट सख्त, मूल सजा देने वाले अधिकारी को ही पुनर्विचार का अधिकार

बिलासपुर : दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (एसईसीआर) के एक कर्मचारी को आपराधिक मामले में बरी किए जाने के बावजूद विभागीय सजा जारी रखने के मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रेलवे की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं । जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने कर्मचारी एल वी कच्छप की याचिका स्वीकार करते हुए वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक, बिलासपुर द्वारा पारित पुनर्विचार आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर माना है ।

कोर्ट ने संबंधित आदेश और उसके आधार पर की गई बाद की कार्रवाई को निरस्त करते हुए मामले को उसी अनुशासनिक प्राधिकारी के पास वापस भेज दिया है, जिसने मूल रूप से कर्मचारी को विभागीय सजा सुनाई थी । हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि कर्मचारी की पुनर्विचार याचिका पर मास्टर सर्कुलर नंबर 67 के पैरा 18 के अनुसार नए सिरे से निर्णय लिया जाए ।

टिकट जारी करने के बदले 800 रुपये लेने का आरोप

मामला एसईसीआर में कमर्शियल क्लर्क के पद पर कार्यरत एल वी कच्छप से जुड़ा है । सक्ती रेलवे स्टेशन पर पदस्थापना के दौरान उन पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने दलालों को चार पीएनआर की टिकट जारी करने के बदले 800 रुपये की अवैध राशि ली । आरोप के आधार पर रेलवे पुलिस बल ने रेलवे अधिनियम के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज किया । इसके साथ ही रेलवे ने विभागीय जांच भी शुरू कर दी । विभागीय जांच में आरोप प्रमाणित मानते हुए 13 दिसंबर 2018 को कच्छप का वेतन तीन चरण नीचे कर दिया गया । उनका वेतन 31 हजार 9 सौ रुपये से घटाकर 29 हजार 2 सौ रुपये कर दिया गया । यह सजा पांच वर्ष के लिए संचयी प्रभाव से लागू की गई थी ।

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आपराधिक मामले में अभियोजन आरोप साबित नहीं कर सका

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इसी बीच विशेष रेलवे मजिस्ट्रेट, बिलासपुर ने 26 नवंबर 2018 को आपराधिक मामले में फैसला सुनाते हुए कच्छप को सभी आरोपों से बरी कर दिया । अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा । मामले में स्वतंत्र गवाह ने भी अभियोजन के महत्वपूर्ण आरोपों का समर्थन नहीं किया था । इसके बाद कर्मचारी ने आपराधिक मामले में बरी होने के फैसले का हवाला देते हुए विभागीय सजा की समीक्षा की मांग की ।

रेलवे ने समीक्षा की मांग की खारिज की

कर्मचारी की मांग पर वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक ने 26 मई 2020 को पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी । बाद में पुनरीक्षण प्राधिकारी ने विभागीय सजा की अवधि पांच वर्ष से घटाकर चार वर्ष कर दी । इसके बाद कर्मचारी ने रेलवे के इस निर्णय को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया ।

हाई कोर्ट ने मास्टर सर्कुलर का दिया हवाला

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने रेलवे के मास्टर सर्कुलर नंबर 67 के पैरा 18 का उल्लेख किया । कोर्ट ने कहा कि यदि विभागीय जांच और आपराधिक मामले में तथ्य और आरोप पूरी तरह समान हैं और कर्मचारी को आपराधिक मामले में मेरिट के आधार पर बरी किया गया है, तो कर्मचारी के प्रतिनिधित्व पर विभागीय मामले की समीक्षा की जा सकती है । कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी समीक्षा उसी अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा की जानी चाहिए, जिसने अंतिम विभागीय आदेश पारित किया हो । इस मामले में मूल सजा का आदेश डिविजनल कमर्शियल मैनेजर, बिलासपुर ने जारी किया था, जबकि पुनर्विचार याचिका पर निर्णय वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक ने लिया । हाई कोर्ट ने माना कि मास्टर सर्कुलर के पैरा 18 के तहत पुनर्विचार करने के लिए वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक सक्षम अधिकारी नहीं थे ।

नियम से अलग तरीके से की गई कार्रवाई टिकाऊ नहीं

डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि जब कानून या नियम किसी कार्य को एक निश्चित तरीके से करने का प्रावधान करता है, तो उसे उसी निर्धारित तरीके से किया जाना चाहिए । निर्धारित प्रक्रिया से अलग तरीके से की गई कार्रवाई कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हो सकती । कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी कर्मचारी के आपराधिक मामले में बरी होने की प्रकृति तय करने के लिए केवल फैसले में लिखे 'बरी' या 'संदेह का लाभ' जैसे शब्दों को देखना पर्याप्त नहीं है । पूरे फैसले को पढ़कर यह देखना होगा कि आपराधिक अदालत ने अभियोजन की कहानी और उसके साक्ष्यों के संबंध में क्या निष्कर्ष निकाला है ।

कैट का आदेश भी निरस्त

हाई कोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट), जबलपुर द्वारा 25 फरवरी 2026 को पारित आदेश को भी निरस्त कर दिया । इसके साथ ही 26 मई 2020 के आदेश और उसके बाद की संबंधित कार्रवाई को भी रद्द कर दिया गया । मामले को वापस संबंधित अनुशासनिक प्राधिकारी के पास भेजते हुए हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि 17 फरवरी 2020 को प्रस्तुत पुनर्विचार याचिका पर मास्टर सर्कुलर नंबर 67 के पैरा 18 के अनुसार नए सिरे से निर्णय लिया जाए । इस आदेश से रेलवे कर्मचारियों के उन मामलों में भी महत्वपूर्ण कानूनी आधार सामने आया है, जहां विभागीय कार्रवाई और आपराधिक मामले के आरोप समान हों तथा कर्मचारी को आपराधिक अदालत से मेरिट पर राहत मिली हो ।
 

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